Sharira Sthan Set – 3
Amazing! Keep practicing. Best wishes. You tried well! Keep practicing. Best wishes. #1. कोष्ठगत पेशियों की संख्या है।
#2. ‘भ्रम’ निर्माण में दोष है ।
#3. श्रोत्र’ है।
#4. षोडश विकारों में निम्नतः सम्मिलित नहीं होता हैं।
#5. गर्भगत शुक्राशय द्वारा दुषित होने से नपुंसक उत्पन्न होता है।
#6. …. दुःखागम ।
#7. आसुरकाय’ प्रकृति का प्रकार है।
#8. कालान्तर प्राणहर मर्म….. प्रधान है।
#9. वाग्भटानुसार जीवितधाम नहीं है।
#10. उण्डुक की उत्पत्ति होती है।
#11. मृतसंशोधनार्थ मृतशव होना चाहिए ।
#12. दश प्राणायतन में से प्रथम छः को मर्म संज्ञा दी है।
#13. दुर्गन्धीत आर्तव चिकित्सा में प्रयुक्त करें ।
#14. वाग्भट शारीर स्थान का तृतीय अध्याय है।
#15. कण्ठ में कफ वेष्टित रहता है, इसलिए गर्भ
#16. सर्वांगप्रत्यंगविभाग- प्रव्यक्तो भवति…… ।
#17. यह शुक्र का प्राकृत गंध है।
#18. हनुसंधि’ प्रकार का संधि है।
#19. द्वारमामाशयस्य…
#20. नाभिप्रभवा होकर उर्ध्वमार्ग में जानेवाली धमनियों की संख्या है।
#21. सही वचन चुनिए । 1) व्यक्त पुरुष इन्द्रियक है।2) अव्यक्त पुरुष लिंगग्राहि है। 3) राशि पुरुष नित्य है । 4) अनादि पुरुष अचिन्त्य है।
#22. रेत इस महाभूत के गुणों से युक्त है । सु.शा. 1
#23. बस्ति स्थान में स्नायु प्रकार है।
#24. परिहर्तव्या शस्त्रेण ।
#25. पंचम कला का नाम है।
#26. लोम’ गर्भ का भाव है।
#27. कूर्चा’ की संख्या होती है।
#28. गर्भावस्था में गर्भ में रोदन का अभाव इस कारण से होता है।
#29. एकधातु पुरुष अर्थात है ।
#30. पद्मालक्त सन्निभम् शुद्ध आर्तव का वर्णन किया है।
#31. ‘वृक्षद्यथाऽभिप्रहतात क्षीरीणः क्षीरमास्त्रवते’ इस कला का दृष्टान्त है।
#32. सर्वभूतों का कारण है। (सु. शा. 1/3)
#33. अष्टममांस में बदरोदकक्वाथ बलादि द्रव्यों सिद्धकर गर्भिणी में आस्थापन प्रयोग से लाभ होता है।
#34. मर्म के बारे में गलत विधान चुनिए ।
#35. Match the options लोकगत भाव 1. अष्टवसम, 2. वियत, ३. आप, 4. युगान्त पुरुषगत भाव(a) सुबीराणी, ( b) सुखम, ( c) मरण, (d) क्लेद
#36. प्रकृति का गुण है।
#37. भूयोर्मध्य स्थपनी तत्र…….
#38. ‘नानायो निशु जन्म’ यह भाव है।
#39. शरीरविचयशरीरउपकारार्थ इष्यते । संदर्भ
#40. जिव्हास्थित सेवनी की संख्या है।
#41. शिरो अन्तराधि द्वौ बाहु सक्थिनीती समासतः षडंगम्।।
#42. शारंगधर के अनुसार षष्ठकला का नाम है।
#43. मूत्रपुरीष स्वेदाश्च विवेचयन्ति – सिराकर्म है।
#44. गलशुण्डिका में स्थित अस्थि संख्या है।
#45. ‘विषयप्रणवं सत्वं’ भ्रंश का लक्षण है।
#46. ‘स्तनरोहित’ मर्मपर आघात होने पर मृत्यु हो है।
#47. सर्व शरीर स्पंदन महाभूत का गुण है।
#48. शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेत….. उत्कट प्रकृतिजायते तेन ।
#49. मूत्रपुरीष स्वेद का विवेचन करना इस धमनी का कार्य है।
#50. गर्भ प्रोषण का केदारकुल्यान्याय इस मांस में वर्णित है।
#51. स्त्रोतस’ की गणना इसके अंतर्गत की गयी है।
#52. रात्रीजागरण से दोषात्मक व्याधि होते है ।
#53. कूर्पर मर्म का अंगुली प्रमाण है।
#54. चेतनायुक्त गर्भ में ‘विवर्धन’ कर्म द्वारा होता है।
#55. ‘अनभिषङ्ग’ मन का गुण है।
#56. शंखास्थिप्रकार का अस्थि है।
#57. यावन्तो हि लोके मुर्तिमन्तो भावविशेषा तावन्तः पुरुषे । सिद्धान्त का वर्णन किया है।
#58. कक्षागत संधि है ।
#59. नातिस्थुलकृशः श्रीमान नरो जीवेत समाः शतम्। संबंधी वर्णन है।
#60. ……पञ्चमे । वाग्भट
#61. अकारुण्य मन का गुण है।
#62. ‘कोषाकारों यथा हवंशुनुपादत्ते दृष्टान्त है।
#63. देवताप्रतिमा में दौहृद होनेवाला गर्भ होता है।
#64. आर्तव का प्राकृत वर्ण होता है ।
#65. वाग्भट के नुसार कोष्ठाश्रित मर्म संख्या है।
#66. षट् कारण बाद में समाविष्ट नहीं है।
#67. जिव्हाऽक्षिनासिका श्रोत्रचतुष्टयसंगमे मर्म स्थान होय ।
#68. ब्रीहीषोडशभाग प्रमाण में होने वाली त्वचास्तर का व्याधि है |
#69. . …. संवृतान्यत्र बलवन्त भवति ।
#70. मुकता स्वरवैकृत्य अरसग्राहिता मर्माघात लक्षण है।
#71. ……. जायते तस्या वर्जित पैतृकर्गुणैः ।
#72. हस्तपाद कण्डराओं का अंत…. में होता है।
#73. वाग्भट अनुसार पुयाभ शुक्र दोष प्रधान होता है।
#74. ‘कपि’ यह इस प्रकृति का अनुकत्व है।
#75. चेष्टा का मुल होने के कारण गर्भ में हस्तपाद प्रथम उत्पन्न होते है। इस आचार्य का कथन है। सु.
#76. जाकर मर्म, सद्यप्राणहर मर्म क्रमशः होते है।
#77. शुद्ध सत्व के बुद्धि को कहते है । 1. सत्याबुद्धि 2. प्रज्ञा 3. ज्ञान 4 मति
#78. पित्तपक्वाशयोर्मध्ये……..!
#79. त्रिविध सत्वों में ‘रोषांश’ से उत्पन्न होता है | च . शा. 4/36
#80. वेदवादिओं के मत से अस्थि संख्या है।
#81. जोड़ियाँ मिलाएं। 1. संधी प्रकार a) प्रतर 2. स्नायु प्रकार b) कपाल 3. पेशी प्रकार c) पृथु 4. अस्थि प्रकार d) अणु
#82. वातवह सिरा का वर्ण होता है।
#83. सुश्रुताचार्य ने अपरा निर्माण का वर्णन इस अध्याय में किया है।
#84. बहवश्च …… सु.शा. 1
#85. ‘दंशन’ में होनेवाला अस्थि प्रकार है।
#86. ‘स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान् सन्तताश्च जरायुणा’. का वर्णन है।
#87. बृहती मर्म है।
#88. सिरा और धमनी भेद में कारण है।
#89. रज्जु की उत्पत्ति होती है।
#90. प्रकृति विकार में सामान्य दर्शन से निम्नतः प्रवृत्ति के कारण की उत्पत्ति होती है।
#91. दृष्ट्वां व्यवायनन्येषा व्यवाय यः प्रर्वतते…. नपुंसक प्रकार है।
#92. शाखा चतुरस्त्र मध्यपंचमम् षष्ठ शरीर इति । संदर्भ
#93. कटी स्थित संधि प्रकार है।
#94. …….ऽप्येवंमसम्पुर्णाङ्गोऽल्पायुर्वाभवति ।
#95. कृम्याशय का वर्णन इस आचार्य ने किया है।
#96. कटुता मरीचे…. सर्वमिद प्रवृत्तयं
#97. ‘अहंकार’ इस मन का गुण है।.
#98. कुर्पर मर्म आघात से लक्षण उत्पन्न होता है।
#99. इस आचार्य ने निद्रा को भूतरात्री कहकर संबोधित किया।
#100. स्त्री में आन्त्र की दीर्घता…. व्याम है।
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