#74. चरकाचार्य ने सर्वप्रथम इस संस्कार को ग्रहण किया है।
#75. चरकनुसार षट्पदार्थ में तीसरा पदार्थ है।
#76. ‘स्वादुतिक्त अन्न’ इस धातु प्रदोषज विकार की सामान्य चिकित्सा है।
#77. कला शब्द का अर्थ है।
#78. सुश्रुत अनुसार इस ऋतु में कफ संचय होता है।
#79. शुद्ध बैडूर्य समान छाया है।
#80. सुश्रुतनुसार वातप्रकोप एवं वातनिरोध लक्षण क्रमशः अभ्यंतर विद्रधि में पाया जाता है।
#81. दाहशस्त्रविषाग्नि से पीडित व्यक्ति को स्नेहपान कराये।’
#82. अतिस्थौल्यहर बिहार में सबसे उत्कृष्ट उपाय है।
#83. ‘अंगमर्द’ लक्षण है।
#84. सुतीर्थ यह गुण चतुष्पाद में से का है।
#85. मुद्ग इस वर्ग का द्रव्य है। सुश्रुत
#86. सुश्रुतनुसार क्लोमप्रदेशी विद्रधि के लक्षण है।
#87. नाम पराजयप्राप्ति ।
#88. आहार द्रव्यों में दधि का कर्म है।
#89. समवायी तुकारणं गुणा ।
#90. लघुव्याधित व्यक्ति संबंध में योग्य विधान चुनिए ।
#91. क्षीर एवं • द्रव्य समान गुण के होने पर प्रभाव से दीपन कार्य करता है। वाग्भट
#92. चरकाचार्यानुसार दिवास्वप्न से दोष प्रकुपित होते है।
#93. वमन के इस लक्षण से दोषों का प्रविलयन होने का ज्ञान होता है।
#94. शमन, कोपन स्वस्थहितं प्रभाव भेद से द्रव्य प्रकार बताये है।
#95. मृदुकरोति स्रोतांसि तथा प्राणधारण कर्म है।
#96. मलहरं श्रेष्ठ ।
#97. पाराशर इस संप्रदाय का शिष्य है।
#98. महाचतुष्पाद अध्याय की विशेषता है!
#99. यवागु और घटक द्रव्य में योग्य मिलाप करें। 1. पक्वाशय शूलनाशक यवागू 2. मदविनाशिनी यवागू 3. कर्शनीय यवागू 4. तैलव्यापद यवागू || a. गवेधुकानाम समाक्षिका b. उपोदिका दधिभ्यां c. यमके मदिरा सिद्धा d. तक्रपिण्याक सिद्धा e. तक्र सिद्धा