#10. प्रत्यक्ष ज्ञान के बाधक कारण में ….. का समावेश नहीं।
#11. दिन के पूर्वाद्ध में इस ऋतु के समान लक्षण दिखाई देते है।
#12. उदर्द व्याधि इस दोष का नानात्मज विकार है।
#13. निम्नत: इस वर्ग में स्त्री जाती का समावेश नहीं।
#14. अभीरू’ किसका गुण है।
#15. अंजन द्रव्य का समावेश इस द्रव्य में होता है।
#16. च सोमराजीविपाचिता ।
#17. आयुर्वेद शास्त्र का अधिकरण है।
#18. व्यायाम का वर्णन चरक संहिता में आया है।
#19. आनूपमत्स्यामिषवेसवार यह लेप कौनसा है।
#20. सूत्रस्थान को सूत्रस्थान कहते है। कारण
#21. त्रिदोषघ्न शाक है।
#22. ‘संधिशैथिल्य’ इस धातु के क्षय का लक्षण है।
#23. पर्याय सुमेलित करें। साध्य साध्यत्व एवं लक्षण – a. सुखसाध्य b. कृच्छ्रसाध्य c. याप्य d. प्रत्याख्येय / (i) मर्मसन्धिआश्रितम् (ii) गर्भिणीवृद्धबालानां (iii) न च कालगुणतुल्य (iv) सर्वमार्गानुसारीणी
#24. मण्ड दोषहरणं में श्रेष्ठ होती है।
#25. स्नेहपूर्व स्वेदन इस अवस्था में देना चाहिए।
#26. घाटा सम्भिद्यते यह लक्षण शिरोरोग का है।
#27. संयोग विभागश्च कारणं, …..। कर्म की परिभाषा है।
#28. ‘बृंहणयोग्य’ काल है।
#29. सामान्यम् एकत्वकरं
#30. प्राणाः प्राणभृतां यत्रश्रिताः सर्वेन्द्रियाणी च ।
#31. वातरक्तनाशनार्थ श्रेष्ठ लेप है।
#32. प्राम्बात् (पूर्व कि हवा) इस ऋतु में वर्ज्य है।
#33. स्तम्भन का अतियोग है।
#34. सर्वशो अनादानं यह अयोग संदर्भ में वर्णन किया है।
#35. स्वेदन काल में हृदयसंरक्षणार्थ उपयोग किया जाता है।
#36. पौष्टिकं वृष्यमायुष्यं सुचि रूप विराजनम्। इस कर्म के लाभ है।
#37. ‘मुखशोषहरं परम्’ गण्डूष है।
#38. दीर्घरोगाणां ।
#39. त्रयोउपस्तंभ में इसका समावेश है।
#40. गव्यतुल्य गुणं, विशेषात शोषिणे एवं सर्वव्याधिहरं पयं इस दुग्ध के बारे में कहा है।
#41. स्तन्य विशोधक गण है।
#42. निरन्तर आहार इसका बृंहण करता है।
#43. काश्यप शारीर स्थान से सुश्रुत शारीर में… अध्याय ज्यादा है।
#44. ‘अच्छपान’ इसे कहते है।
#45. संशोधन अतियोग में यह चिकित्सा करनी चाहिए।
#46. दुर्बलाग्नि इस स्त्रोतस के दुष्टि का हेतु है।
#47. ‘सत्ववान’ है।
#48. ……. कषाय मधुरं पथ्य।.
#49. दोषानुशयिता ह्येषां देहप्रकृतिउच्यते ।। संदर्भ
#50. चक्षुष्य स्पर्शन हितं पादयोर्व्यसनापद्म । बल्ध पराक्रम सुखं वृष्य’ वर्णन है।
#51. धातुमान संस्थान व्यक्ति यह वायु का कर्म है।
#52. योग्य मिलाप करे। – I-महावास्तु II-जालिनी III- सर्षपी [] i- कच्छपिका ii -महारूजा iii – महाशया
#53. दौर्बल्यकराणां…।
#54. लंघन के प्रकार है। (चरक)
#55. दुर्नाम में उपयुक्त मूत्र प्रयोग। सुश्रुत
#56. दिव्य उदक के गुण है।
#57. अव्यथा’ द्रव्य का पर्यायी नाम है।
#58. वाग्भट के नुसार लघु गुण दोष का है।
#59. समा स्वकर्म कुरुते’ यह वर्णन संदर्भ में आया है।
#60. सामान्य व्याधि की संख्या है।
#61. अत्युष्णे वा दिवा पीतो वातपित्ताधिकेन वा । व्याधि है।
#62. तिक्त रस की महाभूत प्रधानता रहती है।
#63. “यस्य वात प्रकुपितस्त्वङ्गमांसान्तरमाश्रित सम्प्राप्ति है।
#64. वैष्णवी निद्रा का वर्णन किया है।
#65. यह आयुर्वेद का पर्याय नहीं है।
#66. हृदय पर कितने अंग आश्रित है।
#67. आमो. च. सू. 25/40
#68. तिक्त सर्पिपान सेवन ऋतु में निर्देशित है।
#69. तमोदर्शन इस धातु दूषित के कारण होता है।
#70. कफप्रकृति का ‘सुश्लिष्टसारसन्धिबन्धना’ लक्षण इस गुण से है।
#71. सर्वज्वरान हन्ति…. तु दीपनः । गण कर्म है।
#72. भिषक का प्रतिरूपक वैद्य —– प्रकार है।
#73. .. चरकनुसार यह निराग्निस्वेद नहीं है।
#74. पित्त दोष का विशेष स्थान है। सुश्रुत
#75. रक्तदोष की विशिष्ट चिकित्सा है।
#76. स्वभावोपरमवाद का वर्णन इस अध्याय में आया है।
#77. खुड्डाक चतुष्पाद अध्याय इस चतुष्क का प्रथम अध्याय है।
#78. त्रिविधं खलु रोगविशेषविज्ञान भवति ॥ संदर्भ है।
#79. विप्रंश’ का समावेश इसमें है।
#80. ‘क्रियापथ अतिक्रान्त’ यह लक्षण निम्न व्याधि में मिलता है।
#81. दंतधावनार्थ कटु रसात्मक श्रेष्ठ द्रव्य है।
#82. ‘मूत्रकृच्छ्र’ व्याधि है।
#83. ‘असंधिका’ धातुजनित रोग है।
#84. श्रीमदव्यसनसूदनम्’ यह गुण इस कर्म का है।
#85. चरक ने सबसे अंत में एवं सुश्रुत ने सर्वप्रथम गण वर्णन किया है। क्रमशः
#86. आमातिसार से ग्रसित रुग्ण को अतिविषा के साथ अनुपान दे
#87. ‘श्रीमद् भ्राजिष्णु’ इस सार का लक्षण है।
#88. प्रकृति की व्यक्ति व्यायाम अयोग्य है। चरक
#89. चरकानुसार लंघनप्रकार एवं निराम्नि स्वेद दोनों में समाविष्ट है।
#90. निम्नतः व्याधि में पूर्व व पश्चात् स्वेदन करें।
#91. ‘कर्ता’ का समावेश होता है।
#92. इस ऋतु के बिहार में अगरू लेप का उल्लेख है।
#93. दर्शनश्रोत्रमेधाग्निवयोवर्णस्वरायुषाम् इस मांस के गुण है।
#94. बाह्य विद्रधि की आकृति होती है।
#95. उल्मुक इव दह्यते’…. का लक्षण है।
#96. सर्षपकल्कावलिप्तुइव चिमचिमायते’ इस शोथ का लक्षण है।
#97. तिक्तसर्पिपान विरेको रक्तमोक्षण ऋतु के कार्य है।
#98. जोडी मिलावे । लक्षण एवं मधुमेह पीडका a) महावास्तु b) अन्तोन्त्रता मध्यनिम्ना c) पृष्ठे वाऽप्युदरेऽपिवा….. d) कण्डराभा…….. / i) विनता ii) कच्छपिका iii) विद्रधि iv) शराविका
#99. द्रव्यादापोथितातोये तत्पुनर्निशि संस्थितात् अर्थात्
#100. ज्वरान्ते उत्पन्न होनेवाला कर्णमूलीक शोथ दोषप्रधान है।