#18. उचित समय पर अर्श चिकित्सा न करने से इस व्याधि की उत्पत्ति होती है।
#19. निद्रा का बोधन हेतु है। (सुश्रुत)
#20. “परिहारे सुखा’ इस स्नेह की मात्रा है।
#21. यह प्राणाभिसर वैद्य का गुण नहीं है।
#22. दाहशस्त्रविषाग्नि से पीडित व्यक्ति को स्नेहपान कराये।’
#23. चरक संहिता के कुल 7 परिषद में से एक परीषद इस अध्याय में हुई थी।
#24. पुनर्जन्म सिद्धि के अनुसार जोडियाँ लगाए । प्रमाण – 1. आप्तोपदेश 2. प्रत्यक्ष 3. अनुमान 4. युक्ति | लक्षण – a. कर्तृकरण संयोगात् क्रिया । b. कर्मसामान्ये फलविशेष। c. लोकानुग्रहप्रवृत्त । d. फलाद्बीजमनुमीयते ।
#25. सदवृत्त वर्णन से लाभ होता है।
#26. सर्वांग प्रत्यंग युगपत सम्भव- इस आचार्य का सिद्धान्त है।
#27. ‘तिलक्षीरगुड’ इस व्याधि का हेतु है।
#28. आस्य से कफवृद्धि है।
#29. एलादि गण का प्रमुख कर्म है।
#30. मध्यदोष में प्रयुक्त मात्रा । सुश्रुत
#31. स्त्रीणां विशेषात कान्ति मदद्रुप।
#32. विद्रधि लक्षण वृक्कजाय ….. ।
#33. विषघ्नी यवागू का मुख्य घटक द्रव्य है।
#34. आचार्य ने उपस्थाता को प्रतिस्त्रावी कहा है।
#35. आनुपमृगवसा में अहितंतम बसा है।
#36. अपतर्पण योग्य ऋतु है। वाग्भट
#37. ‘मातृपितृवाद’ सिद्धांत का जनक है।
#38. इसके अनुसार अग्नि के चार भेद होते है। च.वि. 8/12
#39. सुश्रुत संहिता निदान स्थान में अध्याय संख्या है।
#40. यह रस अपने विपाक के प्रभाव से पुरुषत्व हरण करता है।
#41. नच आक्रम्य जरा, स्थिरी भवती…. सेवन लाभ है।
#42. निम्नता गुरु द्रव्य है।
#43. वाग्भट के नुसार वंक्षणप्रदेशी स्वेदन करना चाहिए।
#44. निम्न व्याधि में शस्त्रकर्म पश्चात ही स्वेदन करे।
#45. आचार्य मैत्रेय की शंका निराकरण का वर्णन अध्याय में है।
#46. 4 कुडव अर्थात होता है।
#47. 1 आदान + 1 प्रक्षेप को एक साथ कहते है।
#48. इस ऋतु में नैऋत्य दिशा से हवा बहती है।
#49. असंचारी मुखे पूर्ण……
#50. ऋतुनुसार मज्जा स्नेहपान इस ऋतु में एवं इस अनुपान के साथ सेवन करें।
#51. श्रीमद व्यसनसूदनम् गुण से युक्त है।
#52. उचित (सम्यक) आहारमात्रा इस लक्षण से युक्त होती है।
#53. ‘चक्षुष्य’ निम्नतः पंचमूल का गुण है।
#54. प्रवातं प्रमिताहारं मुदमन्थं….. ऋतु में वर्ज्य करना चाहिए।
#55. मारुत आर्तस्य यह अतियोग लक्षण है।
#56. बैद्य समुहों…..
#57. जीमूतक के योग है।
#58. अविभ्रमेण । अनुमान से किसकी परीक्षा करनी चाहिए।
#59. सर्षपकल्कावलिप्तुइव चिमचिमायते’ इस शोथ का लक्षण है।
#60. उचित पर्याय चुनिए ! दोष – 1. वात 2. पित्त 3. कफ | a.तर्ष b. कोथ c. उपदेह
#61. वमन के इस लक्षण से दोषों का प्रविलयन होने का ज्ञान होता है।
#62. क्रियापथं अतिक्रान्ता केवलं देहमाप्लुता।
#63. चरक ने ‘क्वाथ’ के लिए पर्यायी शब्द का उपयोग किया है।
#64. श्रीमदव्यसनसूदनम्’ यह गुण इस कर्म का है।
#65. कटु रस प्रधान द्रव्य दंतपवन में उपयुक्त है। निंब
#66. शुद्ध रक्त न अधिक पतला न अधिक गाढा होना गुण है।
#67. चरकानुसार नासागत रक्तपित्त के प्रकार है।
#68. अधोगुडा इस वनस्पति का पर्याय है।
#69. दौर्बल्यं मुखशोष पाण्डुत्व यह लक्षण क्षय का है।
#70. शरद ऋतु में इस राशि का समावेश होता है।
#71. लसिका’ ये दोष का स्थान है।
#72. चरकानुसार वंक्षणस्थित विद्रधि का लक्षण है।
#73. इस ऋतु में दक्षिण दिशा से वायु बहती है।
#74. तिक्त रस की महाभूत प्रधानता रहती है।
#75. इषउर्ज मांस का ऋतु है।
#76. गव्यमांसरस सेवन उल्लेख ज्वर प्रकार में है। (च.सु. 2/16)
#77. अभीरू’ किसका गुण है।
#78. विष्कीर पक्षीवसा में अहिततम वसा है।
#79. उत्सेधविस्तारतः परमरत्नीः षोडशः ।
#80. चरक रात्रिस्वभावप्रभवा निद्रा को कहते है।
#81. तीक्ष्णाग्निवात प्रभूतकोष्ठ वायु इस अतिस्थूल दोष का कारण है।
#82. मुद्ग इस वर्ग का द्रव्य है। सुश्रुत
#83. स्थिर गुण इस षड्विध उपक्रमों में नहीं है।
#84. निम्न में से बलवान पंचविध कषाय कल्पना है।
#85. निम्न में से इस व्याधि का क्षयज प्रकार है।
#86. वाग्भट अनुसार अंजन शलाका की लंबाई है।
#87. स्नैहिक धूमपान की मात्रा है।
#88. पुनर्जन्मसिद्धि का वर्णन इस चतुष्क में है।
#89. संग्रहनुसार 8 अंगुल लंबाई इस घूमनेत्र की होती है।
#90. शरदग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशो…. गर्हितम् ।
#91. तमप्रवेश यह लक्षण मूर्च्छा में पाया जाता है।
#92. ग्रहसंबंधी रोग नाशक मूत्र है।
#93. ‘मात्सर्य’ भाव है।
#94. गोपानसीनां आगारकर्णिकेवार्थ चित्तके। दृष्टान्त है।
#95. संशुष्करेतोरूधिरा ….. योग्य रूग्ण है।
#96. अग्निरेव शरीरे पित्तान्तर्गतः । इस आचार्य का कथन है।