#27. कफप्रकृति का ‘सुश्लिष्टसारसन्धिबन्धना’ लक्षण इस गुण से है।
#28. यवागु और घटक द्रव्य में योग्य मिलाप करें। 1. पक्वाशय शूलनाशक यवागू 2. मदविनाशिनी यवागू 3. कर्शनीय यवागू 4. तैलव्यापद यवागू || a. गवेधुकानाम समाक्षिका b. उपोदिका दधिभ्यां c. यमके मदिरा सिद्धा d. तक्रपिण्याक सिद्धा e. तक्र सिद्धा
#29. आमस्तंभशीतशूलवेपन प्रशमनं में श्रेष्ठ है। 84.
#30. शीतसमुत्थ एवं उष्णसमुत्य इस व्याधि के 2 भेद है।
#31. ‘शोधनार्थे च युज्यते’ स्नेहमात्रा है। चरक
#32. निम्न में से वैद्य वृत्ति में समाविष्ट नहीं है।
#33. संप्रहारकलिप्रियम् मद का लक्षण है।
#34. ‘अपतानक’ इस मार्ग का व्याधि है।
#35. षड्धातुसंयोगात् गर्भाणां संभवस्तथाः । उदाहरण है।
#36. मधु का श्रेष्ठ भेद है।
#37. प्रशस्त बध्दविण्मूत्रं यह वर्णन मूत्रसंबंधी है।
#38. शमन धूम का पर्याय शब्द है।
#39. सौमनस्यजनन् कर्म में श्रेष्ठ है।
#40. इस आचार्य को चरक चतुरानन कहते है।
#41. औत्तरभत्तिक घृत एवं सर्व वातघ्नमौषधम् इस वेग की चिकित्सा है।
#42. मृदुकरोति स्रोतांसि तथा प्राणधारण कर्म है।
#43. जल प्रसादन विधि है।
#44. वाग्भट के नुसार बृंहण धूमपान के काल है।
#45. महाकषाय और घटक द्रव्य में योग्य मिलाप करें। 1. लेखनीय महाकषाय 2. अनुवासनोपग महाकषाय 3. शोणितस्थापन महाकषाय 4. शुक्रशोधन महाकषाय || a-मृतकपाल b-अतिविषा c-मदनफल d-नलद e- समुद्रफेन
#46. चतुष्प्रकार संशुद्धि में यह कर्म नहीं है।
#47. वातप्रकोपक कारणों का उल्लेख इस आचार्य ने किया।
#48. पिबेत् सिधु माध्वीका। इस ऋतु का वर्णन है।
#49. हृदय पर कितने अंग आश्रित है।
#50. वराह आदि पशु का मांस सेवन करके उष्णवीर्ययुक्त पदार्थ का सेवन करना ……. का उदाहरण है।
#51. शोथभेद व आचार्य I- आकृतिनुसार शोथ (पृथु उन्नत ग्रथित) II – स्थानविशेष शोथ (सर्वांग, एकांग) III- एक प्रकार शोथ (उत्सेध) IV – उर्ध्वगत, मध्यगत अधोगत शोथ || 1. चरक 2. सुश्रुत 3. वाग्भट 4. माधवकर
#52. स्त्रीणां विशेषात कान्ति मदद्रुप।
#53. पुनर्जन्मसिद्धि का वर्णन इस चतुष्क में है।
#54. हृदयगतविद्रधि की चिकित्सा इसके जैसी करे।
#55. निम्न में से वाक्य दोष का प्रकार है।
#56. 1 कर्ष द्रव्य में अंगुल धुमवर्ती बनाने का विधान है।
#57. रोगी के निर्देशकारित्वम् इस गुण का वर्णन इस आचार्य ने किया।
#58. मलय पर्वत से आने वाला दक्षिण दिशा का वायु ऋतु में बहता है।
#59. विशेषत: यह पुष्प नक्तांधता में उपयुक्त है।
#60. सामान्यम् एकत्वकरं
#61. कफ के गुणों का वर्णन इस आचार्य ने किया है।
#62. दुर्बलाग्नि इस स्त्रोतस के दुष्टि का हेतु है।
#63. निरन्तर आहार इसका बृंहण करता है।
#64. इस काल में नस्य का सेवन नहीं करना चाहिए। (च.सू.1/57)
#65. इसका समावेश इंद्रिय में होता है।
#66. बृंहणनां श्रेष्ठ कर्म है।
#67. रक्तप्रसादन चापि …… अग्निश्च दीपनम्।
#68. निवृत्ति………
#69. पौष्टिकं वृष्यमायुष्यं सुचि रूप विराजनम्। इस कर्म के लाभ है।
#70. ‘विकार आगम’….. का लक्षण है।
#71. निम्न में से संतर्पण जनित विकार हैं।
#72. ‘कर्ता’ का समावेश होता है।
#73. इसको शिरस्थान या श्लोकस्थान कहा जाता है।
#74. बाग्भटानुसार अंजन शलाका की लंबाई है।
#75. ‘पांडुता’ इस धातुक्षय का लक्षण है।
#76. ‘प्रत्येकश्रेणी’ द्रव्य का समावेश इस वर्ग में किया है।
#77. प्रवातं प्रमिताहारं मुदमन्थं….. ऋतु में वर्ज्य करना चाहिए।
#78. निम्नतः रूग्ण में स्वेदन नहीं करना चाहिये ।
#79. क्रूरकोठी पुरुष को…. दिन स्नेहपान करना चाहिये।
#80. शमन, कोपन स्वस्थहितं प्रभाव भेद से द्रव्य प्रकार बताये है।
#81. स्नेह की हस्व मात्रा इतने काल में पचति है।
#82. विषनाशक लेप में शिरीष के साथ प्रयुक्त होता है।
#83. ‘शिक्य’ प्रयोग जल की विधि में करते है।
#84. सारासव की संख्या है।
#85. विशेषेण ग्रहणी अर्श विकारार्थ इस शाक का प्रयोग किया जाता है।
#86. आकृतिभेद से शोध के प्रकार इस आचार्य ने बताए है।
#87. मैथुनं गर्भदर्शनात अनुमान का लक्षण है।
#88. सूचक यह धारणीय वेग है।
#89. कुष्ठव्रणविषापहम् इस मूत्र का गुण है।
#90. सालसारादि गण का कर्म है।
#91. सुश्रुतनुसार पित्तजव्याधि में घृत का अनुपान है।
#92. ‘बातरोग’ यह लक्षण है।
#93. भग्नसंधानक गण है। सु…..।
#94. दोषों के कालकृत गतिभेद है।
#95. रौद्रभैरवात् मिथ्यायोग है।
#96. वेद का अधिकरण है।
#97. अर्कक्षीर का उपयोग होता है।
#98. ‘व्यापाद’ का समावेश इस दशविध पापकर्म में होता है।
#99. ‘रूकपर्वणा’ धातुप्रदोषज विकार है।
#100. इंद्रियोपक्रमणीय अध्याय का समावेश इस चतुष्क में होता है।