#19. रक्तातिसार में छागपय इस रूप में चिकित्सार्थ प्रयुक्त होता है।
#20. प्रलेप की मात्रा होती है।
#21. ग्रहणी के आश्रित दोषों की चिकित्सा कौनसे व्याधि के समान करते है। अ.ह.चि. 10
#22. सप्तपर्णा कप का प्रयोग प्रमेह चिकित्सार्थ करते हैं।सु.चि. 11
#23. पाणिपादतलैः श्लक्ष्णैः यह कौनसे कास का लक्षण है।च. चि. 18.27
#24. Myasbtenia gravis is charactrerized by all, EXCEPT
#25. स्नेहपीतस्य गन्दाने उदर का विशेष हेतु है।
#26. पीतं पीतं हि जलं शोषयतस्तावतो ना याति शमम् है|
#27. प्रक्रामन चेपते यस्तु खंजन्निव च गच्छति..है।
#28. श्लेष्मणः क्षपणं यत् स्यात् न च मारुतमावहेत् । तत् सर्वं सर्वदाकार्यम्… भेषजम् ।
#29. अन्निसंदिपनार्थ च रक्त संग्रहणाय च दोषाणां पाचनार्थ च परं तिक्तैरुपचरेत ।…. व्याधि चिकित्सा सूत्र है।
#30. पाण्डुदेहो यथापूर्व क्षीयन्ते चास्य पातवा लक्षण ?
#31. दुःखानि बहुव्याधिकराणि कौनसे व्याधि के संदर्भ में कहा है । च.चि. 14.25
#32. भूनिंबाधचूर्ण का रोगाधिकार है।
#33. गैरिकोदकप्रतिकाशं यह इस रक्तदृष्टि का लक्षण है।
#34. माधव निदान के अनुसार अल्पचेष्टा से क्षुद्रश्वास, तृष्णा,मोह, निद्रा, श्वासावरोध, क्षुधा, स्वेदाधिक्य, दौर्गन्ध्य इत्यादि लक्षण व्याधि में होते है। मा. नि. 34/3
#35. सुश्रुत अनुसार अतिसार व्याधि के कितने प्रकार है।
#36. स्मृति निम्न में से किसका गुण है।
#37. वातप्रकृति व्यक्तियों के लिये यह मद्य हितकर होता है।
#38. अनुशब्दं कुरुते च नित्यम्। यह इस गलगंड का लक्षण है।
#39. मज्जागत ज्वर …..होता है।
#40. उपनाह गुल्म की चिकित्सा है।
#41. प्रियता चान्गुण्ठने यह कौनसे व्याधि का पूर्वरूप है।च. चि. 8.34
#42. सुश्रुत अनुसार प्राणायाम, उद्वेजन व्याधि चिकित्सा है।
#43. क्षयज तृष्णा में इस व्याधि की चिकित्सा प्रयुक्त होती है।
#44. पाणिपादं च संशोध्य सिराः सरनाबुकंडरा । यह व्याधि का लक्षण है।
#45. चरकानुसार सिध्म कुछ.. • दोष प्रधान होता है।
#46. प्रमेहन, वातघ्न एवं मेदोध्न चिकित्सा इस वातव्याधि में करते हैं।
#47. पिण्डिक्योरुद्वेष्टन यह कौनसे ज्वर का लक्षण है। च.नि. 1
#48. विविध भूताशुचिस्मद्… च.नि. 8
#49. ……….इति ख्यातो रसमास्तसंभवः ।
#50. शीताभिरद्भिश्च विवृद्धमेति यह इस तृष्णा का लक्षण है।
#51. वस्त्यमस्त्यशिर का नाडीस्वेद इस व्याधि में प्रयुक्त होता है।
#52. … .बस्ति होती है.
#53. हर्दि वेषधारणे व्याधि का विशेष हेतु है।
#54. योनि निम्न में से इसका प्रयाय है।
#55. श्लक्ष्ण गण्डत्वं उदयोग का……….. है।
#56. दोषप्रधान कुष्ठ सुखसाध्य होता है।
#57. कृमिज शिरोरोग की चिकित्सा है।
#58. नरसिंहघृत इस आचार्य ने बताया है।
#59. केशवख अतिवृद्धि कौनसे व्याधि का पूर्वरूम है।
#60. सुश्रुत नुसार अन्येयुष्क ज्वर….धातु आश्रित होता है।
#61. आंतरभक्तिक स्नेहपान इस व्याधि की चिकित्सा है।
#62. यह बद्धगुदोदर की चिकित्सा है।
#63. अण्डस्तब्ध इस मूत्रकृच्छ्र को कहते हैं।
#64. प्रमेह पीडका चिकित्सार्थ परिषेचन के लिये….. क्वाथ प्रयुक्त होता है।
#65. अन्नविद्वेषो हृदयाशुद्धिगौरवे ।
#66. मलसंग निम्न में से इसका लक्षण है।
#67. प्राणियों का जीवन और वल क्रमशः है।
#68. मा का व्यवायी गुण ओज के गुण | के विपरीत है।
#69. माधवनिदान में कितने शुकदोष वर्णित है।
#70. ..स्व अपचारात् । वाग्भट
#71. काकणन्तिफल के समान मलप्रवृत्ति इस अतिसार में होती है।
#72. भल्लातक योग कितने है। 1.2.16
#73. छर्दि यह व्याधि….है।
#74. प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय बार दी गयी निरूहवस्ति क्रमशः दोषों को बाहर निकालती है।
#75. लशुनक्षीर का रोगाधिकार है।
#76. सन्निपातज अतिसार होता है।
#77. विच्छिन्न मद्य सहसा योऽतिमद्यं निषेवते का हेतु है।
#78. वाग्भट के अनुसार गुल्म के प्रकार है।
#79. पुराणघृत का रस और स्वरूप निम्न में से क्रमशः है।
#80. आचार्य चरकानुसार शिलाजतु के कितने प्रकार है। 1.3.48
#81. बिंदिशीनाशक अपराजिता का वर्णन किसने किया है।
#82. क्षारगुडिका इस कल्प का रोगाधिकार है।
#83. प्राणा प्राणभृतं तदयुक्त्या निहत्यसून् ।
#84. वैश्रुत्य यह इस कर्णरोग का लक्षण है। चरक
#85. शोष व्याधि का निदानार्थंकर रोग कौनसा है।
#86. चर्मदल निम्न में से इस स्रोतस दृष्टि का लक्षण है।
#87. कालकृत, अकालकृत थे…. व्याधि है।
#88. चरक ने पलितघ्नमनुत्तमम् इस विशेषण का प्रयोग इसके
#89. प्रमेह में हरिद्रा प्रयोग यह कौनसा उपशय है।
#90. अन्तर्गलं स्वरमलक्ष्यपरिवरेण यह इस स्वरभेद का लक्षण
#91. उग्रआध्मान यह इस व्याधि का लक्षण है।
#92. अलस्क कुछ में कौनसे दोषों का प्राधान्य होता है। चरक
#93. Which ane is the pulmonary non cardiac cause
#94. हारिद्रवर्ण अथवा सरक्त मूत्र प्रवृत्ति इस मूत्राघात का लक्षण है।
#95. प्रभंजन । वाग्भट
#96. संताप देह मानस…है|
#97. शतावर्यादित का रोगाधिकार है।
#98. उचितस्वकर्मणो हानि….. इस व्याधि का पूर्वरूप है।