#26. आचार्य चक्रपाणिनुसार वृष्य द्रष्म के कितने प्रकार है। च. चि. 3.4
#27. सुश्रुत के अनुसार अपतर्पण, बमन, आस्थापन,अनुवासन…… व्याधि में निषिद्ध है।
#28. बातगुल्मद्रोगप्लीहाकी च मानवः यह इस व्याधि का लक्षण है।
#29. सुश्रुत नुसार प्रमेह पीडका संख्या कितनी है।
#30. भेषज के प्रकार है।
#31. हिक्का श्वास तथा कासः तमसातिदर्शनम्। लक्षण
#32. औषचोषपरिदाह यह का लक्षण है।
#33. सर्पिष्युपरिभक्तानि स्वरभेद….. ।
#34. पारिजातक क्वाथ का प्रयोग कौनसे प्रदेश में करते हैं।
#35. वेगवत् मांसतोयप्रख्य मलप्रवृत्ति… अतिसार में होती है। चरक
#36. वाग्भट के अनुसार अश्मरी के प्रकार होते है।
#37. योगराज इस व्याधि का रोगाधिकार है।
#38. वरटीदष्टसंस्थान शोथ इस व्याधि का लक्षण है।
#39. पाणदाह कौनसे व्याधि की चिकित्सा है।
#40. सूतशेखर रत का प्रयोग कौनसे व्याधि में करते है।
#41. Patient is in anuria, what is not to be done.
#42. शब्दासहिष्णुता यह इस हद्रोग का लक्षण है।
#43. यह कुछ कफपित्प्रधान है।
#44. नासाभंग, स्वरोपघात… इस कुछ का लक्षण है।
#45. माधव निदान के अनुसार अल्पचेष्टा से क्षुद्रश्वास, तृष्णा,मोह, निद्रा, श्वासावरोध, क्षुधा, स्वेदाधिक्य, दौर्गन्ध्य इत्यादि लक्षण व्याधि में होते है। मा. नि. 34/3
#46. सूर्यावर्त विपर्यय यह व्याधि इस आचार्य ने बताया है।
#47. अधिमास यह इस व्याधि का अन्य नाम है।
#48. हर्दि वेषधारणे व्याधि का विशेष हेतु है।
#49. पित्तज विसर्प का चिकित्सा सूत्र है।
#50. यह व्याधि खुडकाश्रित होता है।
#51. महापंचगव्यपूत का रोगाधिकार है।
#52. मत्स्यशकलोपमं लक्षण कौनसे कुछ का है।
#53. चरक के अनुसार मूत्रकृच्छ्र के प्रकार है।
#54. निरामकफ निम्न में से नहीं होता।
#55. द्वेषः सुरानविकृतेषु यह इस व्याधि का लक्षण है।
#56. व्यानावृत्त प्राणवायु की यह चिकित्सा है।
#57. यह निरुह बस्ति शुक्रकृत होती है।
#58. एकायाम इस व्याधि को कहते हैं। वाग्भट
#59. कालमेह होता है।
#60. सुश्रुत के अनुसार निम्न में से थे दुर्निवारणीय व्याधि है
#61. वृद्ध
#62. अधोग रक्तपित होता है।
#63. जटिलाभानं केशेषु यह कौनसे व्याधि का पूर्वरूप हैं। च.नि.
#64. आचार रसायन का वर्णन रसायनपाद में आया है।
#65. सुश्रुत अनुसार अतिसार व्याधि के कितने प्रकार है।
#66. मूलकतैल का रोगाधिकार है।
#67. निम्न में से कौनसा तृष्णा प्रकार आचार्य चरक ने वर्णन नहीं किया है। च.चि. 22.
#68. आचार्य चरकानुसार रसायन प्रकार कौनसे है।
#69. पित्तोदर के दुर्बल रुग्णों में…. यह चिकित्सा करनी चाहिये।
#70. आचार्य चरक ने उपद्रव का वर्णन कौनसे अध्याय में किया है।
#71. पित्तज प्रमेह में… यह चिकित्सा प्रयुक्त होती है।
#72. आचार्य चरक नुसार शिलाजीत प्रकार कितने है ।
#73. बसंतोद्भव कफज वर की साध्यासाध्यता
#74. बालानां च अंगवर्धनं…. की फलश्रुति है।
#75. शब्दासहिष्णुता यह इस व्याधि का लक्षण है।
#76. कृमिज हृद्रोग में यह चिकित्सा प्रयुक्त होती है।
#77. वातरक्त एक वर्ष बाद…… है।
#78. यह कुछ वातपित्तज होता है।
#79. श्वासरोग चिकित्सा में यह उपक्रम वर्ज्य है। सु. 3. 51.15
#80. च्यवनप्राश निर्माणार्थं आमलकीफल कितने लेते है।
#81. अश्मरी, शर्कराजन्य मूत्रकृच्छ्र की चिकित्सा….. मूत्रकृच्छ्र के समान करनी चाहिये।
#82. कदम्बपुष्पाकृति स्वरूप कौनसे अश्मरी का होता है।च.चि.26.37
#83. सुश्रुत के अनुसार पुरीषण कृषि संख्या कितनी है। सु.क.54.7
#84. सुश्रुत के अनुसार कष्यजिक कुछ में दोषप्राधान्य है।
#85. रोचनाशंखचूर्ण वर्णाभ मूत्रप्रवृत्ति.. इसमें होती है।
#86. पाणिपादं च संशोध्य सिराः सरनाबुकंडरा । यह व्याधि का लक्षण है।
#87. पर्यायातस्य हिक्का या अमूलादसंतता सा…. ।।
#88. शुक्रक्षय का लक्षण है।
#89. पाणिपादस्फुटनं तीव्रवेदना। यह इस कुष्ठ का लक्षण है।
#90. योजनं शतमधिकं वा गच्छेत् यह कौनसे व्याधि की चिकित्सा है। सु.चि.11.11
#91. सक्छन: क्षेपं निगृहीयाद यह इस व्याधि का लक्षण है।
#92. शान्तं शान्तं प्रकुप्यति यह इस रक्तपित्त का लक्षण है।
#93. यानम् अयानैः यह निम्न में से इस उन्माद का लक्षण है।चरक
#94. महागदं महावेगं अनिच्छप्रकार यह कौनसे व्याधि के सन्दर्भ में कहा गया है। च.लि
#95. रहस्यभाषी वह इस निम्न में से उन्माद का लक्षण है।
#96. आदावन्ते च मध्ये च मारुतं परिरक्षता संदर्भ
#97. महावास्तु परिग्रहा यह कौनसी पीडका है।
#98. रक्तपित्तकफान् वायुर्दुष्टो दुष्टान् बहिः सिराः । नीत्वा रुद्धगतिततैर्हि कुर्यात्वक्मांस संश्रयम् । व्याधि की सम्प्राप्ति है। मा.नि.36/1
#99. कोष्ठ गत्वा क्षोभवति अस्य रक्तं तत् च अधस्तात काकति प्रकाशम् | यह लक्षण इस व्यापि का है। सुश्रुत
#100. स्त्रीषु अहर्षणम् यह निम्न में से इस ग्रहणी का लक्षण है।