#29. ‘क्रियापथ अतिक्रान्त’ यह लक्षण निम्न व्याधि में मिलता है।
#30. इस वैद्य को कण्टकभूत उपमा दी गयी है।
#31. मधु का श्रेष्ठ भेद है।
#32. भस्मकनाशक ऐसा वर्णन इस दुग्ध संबंधी आया है।
#33. सर्वशो अनादानं यह अयोग संदर्भ में वर्णन किया है।
#34. ‘संकरे च गद’ व्याधि चिकित्सा में होती है।
#35. चरकनुसार यूषभेद है।
#36. शीतकाल में रात्रि स्नेहपान करने से व्याधि होता है।
#37. तर्पणं च चाक्षिशुलिनाम्। इस दुग्ध का प्रयोग होता है।
#38. दंतधावनार्थ कटु रसात्मक श्रेष्ठ द्रव्य है।
#39. पांचप्रासृतिका पेया में सर्पी तेल वसा मज्जा एवं है।
#40. असत्य विधान चुनिए । 1. ज्योतिष्मति मूलिनी द्रव्य है। 2. अपामार्ग फलिनी द्रव्य है। 3. खर दुग्ध अपस्मार उन्माद ग्रहविनाशक है।. 4. अविदुग्ध हिक्काश्वासकर है।
#41. सुश्रुतनुसार कुल रोग तथा द्रव्य संख्या होती है।
#42. वयस्थापने …….. । वाग्भट
#43. गव्यमांसरस सेवन उल्लेख ज्वर प्रकार में है। (च.सु. 2/16)
#44. स्नेह की मध्यम मात्रा…. काल में जीर्ण होती है।
#45. यवागु और घटक द्रव्य में योग्य मिलाप करें। 1. पक्वाशय शूलनाशक यवागू 2. मदविनाशिनी यवागू 3. कर्शनीय यवागू 4. तैलव्यापद यवागू || a. गवेधुकानाम समाक्षिका b. उपोदिका दधिभ्यां c. यमके मदिरा सिद्धा d. तक्रपिण्याक सिद्धा e. तक्र सिद्धा
#46. वृष्या यवागू का प्रमुख घटक द्रव्य है।
#47. निम्न में से व्रणधूपनार्थ उपयोगी द्रव्य है।
#48. निष्कृष्यते इवाक्षिणी’ लक्षण इस शिरोरोग में होते है।