#24. पर्वसु स्थूलमूलानि कृच्छ्राण्यंरूषि । लक्षण है।
#25. केशशातनस्फुटनधूमनार्थ मूर्धी तैल का प्रकार उपयोगी है।
#26. ‘संधानकर: शरीरस्य’ इस दोष का कार्य है।
#27. नयनप्रवेश, पिप्पलिका उच्चार लक्षण इस संदर्भ में आए है।
#28. आरोग्यलाभ एवं इन्द्रिय विजय यह लाभ प्राप्त होते है।
#29. सुश्रुत के नुसार प्रवाहिका लक्षण स्नेह का लक्षण है।
#30. रक्तस्तंभन के उपायों में सर्वोत्तम है।
#31. स्थिरगुण के विरुद्ध गुण है।
#32. सांभार द्रव्य का वर्णन इस अध्याय में है।
#33. वाग्भट के नुसार वंक्षणप्रदेशी स्वेदन करना चाहिए।
#34. करहाट के विरेचन योग है।.
#35. धर्म अर्थ काम मोक्षणाम्…..मूलं उत्तमम् ।
#36. अतिस्थौल्य रूग्ण में इस कारण से व्यवायकृच्छ्रता होती है।
#37. सारासव की संख्या है।
#38. सुश्रुत नुसार निद्रा प्रकार है।
#39. कियन्तः शिरसीयाध्याय में ‘पाप’ कहा है।
#40. ‘हिताशी स्यान्मिताशी स्यात् काल भोजी जितेन्द्रियः इस रोग के संदर्भ के बारे में कहा है।
#41. अंजन द्रव्य का समावेश इस द्रव्य में होता है।
#42. चूर्ण की मात्रा है। सुश्रुत
#43. अहिततम विष्कीरपक्षीवसा…..।
#44. चरक के अनुसार सबसे बाहर वाली त्वचा का स्तर है।
#45. ……. नाम उपलब्धीकारणं
#46. सृष्टविण्मूत्र’ लक्षण विपाक अंतर्गत पाया जाता है।
#47. यव… कर्म में श्रेष्ठ है।
#48. यथाविषं यथा शस्त्र यथा अग्निर्यथा….. संदर्भ ।
#49. योग्य मिलान कीजिए। a)सुखसाध्य b) कृच्छ्रसाध्य c) याप्य d) प्रत्याख्येय ॰॰ i) मर्मसन्धिआश्रितम् ii) गर्भिणीवृद्धबालानां iii) न च कालगुणतुल्य iv) सर्वमार्गानुसारीणी
#50. …..व्याधिकराणां ।
#51. अर्कक्षीर का उपयोग होता है।
#52. चरक संहिता में कुल संभाषा परिषद है।
#53. हिक्का एवं श्वास विद्रधि के…… है।
#54. अग्निरेव शरीरे पित्तान्तर्गतः कथन है।
#55. ‘प्रततं वातरोगिनी’ इस धातुक्षय का लक्षण है।
#56. व्यायाम के लाभ है।
#57. प्रशस्त बध्दविण्मूत्रं यह वर्णन मूत्रसंबंधी है।
#58. सहज, कालज, युक्तिकृत त्रिविध…. है।
#59. यंत्र से निष्कासित ईक्षुरस का गुण है।
#60. धात्री निशा… I
#61. प्रकृतिभुतस्त लोके चरत निम्न में से वायु का कर्म है।
#62. अक्षिपीडक पर्याय है।
#63. दोषघ्न लेप…. अंगुल मोटा होता है।
#64. मदरोगनाशिनी यंवागु में इसका समावेश होता है।
#65. शुक्र का गंध रहता है।
#66. शारर्ङ्गधरनुसार विरेचनार्थ तीक्ष्ण औषधि मात्रा है।
#67. निम्न में से पित्त का शुभ अशुभ कर्म है।
#68. रोपणार्थ श्रेष्ठ शलाका है।
#69. ऋत्वोर अन्त आदि सप्ताह ….स्मृतः ।
#70. वातवृध्दि में तैल का उपयोग करना इस सिध्दांन्त के अनुसार योग्य है।
#71. संग्रहकार ने… स्थान पर जिव्हाबंधन प्राणायतन कहा है।
#72. इस सद्वृत्त आचरण का प्रभाव मेध्यकर है।
#73. सुश्रुतानुसार व्यायाम कर्शित व्याधि में स्नेहपान करें।
#74. नित्यानुशायिनी व्याधि होते है।
#75. उपघात एवं उपताप यह दूषित… प्रदोषज विकार है।
#76. 1) गुड 2) खांड 3) चीनी 4) मत्स्यण्डिका उत्तरोत्तर निर्मल है, योग्य क्रम लगायें।
#77. उरूस्तंभ व्याधि में प्रायः कर्म करे।
#78. प्राणाः प्राणभृतां यत्रश्रिताः सर्वेन्द्रियाणी च ।
#79. शरद ऋतु में इस राशि का समावेश होता है।
#80. सुश्रुतनुसार जल प्रसादनार्थ प्रयुक्त पदार्थ है ।
#81. अनुपक्रम्य व्याधि का वर्णन किया है।
#82. तिक्ताञ्जन के लिए……. पात्र का / शलाका का उपयोग करना चाहिए।
#83. पथ्याभ्यासाद् विपर्यय सुखसाध्यस्य विपर्यये ।
#84. मर्मसंरोध’…… का उपद्रव है।
#85. बस्ति शिर का अंगुली प्रमाण है।
#86. जीवनपंचमूल… दोषों का शमन करती है।
#87. तर्पण सर्वरसाभ्यासात्… श्रेष्ठ है।
#88. चतुष्प्रकार संशुद्धि में यह कर्म नहीं है।
#89. ‘कायाग्नि बाधते’ वर्णन इस ऋतु में आया है।
#90. . ……. वातहराणाम।
#91. सौमनस्यजनन् कर्म में श्रेष्ठ है।
#92. उल्मुक इव दह्यते’…. का लक्षण है।
#93. शोथभेद व आचार्य I- आकृतिनुसार शोथ (पृथु उन्नत ग्रथित) II – स्थानविशेष शोथ (सर्वांग, एकांग) III- एक प्रकार शोथ (उत्सेध) IV – उर्ध्वगत, मध्यगत अधोगत शोथ || 1. चरक 2. सुश्रुत 3. वाग्भट 4. माधवकर
#94. वनस्पतैमुलैछिले स्कन्ध शाखाप्ररोह…. नियतोविनाश । दृष्टान्त है।
#95. वाग्भट के नुसार कषाय, कटु, तिक्त में बलवान रस है।
#96. तु निश्चेष्ट कारणं गुणः
#97. बाग्भट के नुसार सर्वात गुरु स्नेह है।
#98. प्रकृति वर्ण का क्षिप्रउत्थान प्रशम करने वाला शोथ है।
#99. असंचारी मुखे पूर्ण……
#100. पार्श्वशूलहर में पुष्करजा… का प्रयोग होता है।