Sharira Sthan Set – 4
Amazing! Keep practicing. Best wishes. You tried well! Keep practicing. Best wishes. #1. पूतिपूय शुक्र दोष प्रधान रहता है।
#2. एकद्वार तनुत्वक वर्णन इस आधार का है।
#3. गर्भवती स्त्री को ‘राजस दर्शन’ की इच्छा हुयी तो होनेवाला गर्भ होता है। (सु. शा. 3/19)
#4. गर्भ वातपित्तकफ व सर्वधातु से युक्त होता है।
#5. योग्य मेल करे । 1. मूल सिरा (सुश्रुत ) a) हृदय 2. मूल सिरा (वाग्भट ) b) 10 . 3. मूल सिरास्थान ( सुश्रुत ) c) नाभी 4. मूल सिरास्थान (वाग्भट) d) 40
#6. इस आचार्य ने फुफ्फुस का वर्णन कोष्ठांग में नहीं किया है।
#7. प्रतानवती’ भेद है।
#8. विपुल स्त्रोतः कुण्डलिनी आश्रित विशेषण उपयुक्त है।
#9. जोडीयां मिलाएं – 1. मध्यकायगत स्नायु a) 4 2. उर्ध्वजत्रु पेशी b) 34 3. शाखागत अस्थि c) 120 4. तिर्यक धमनी d) 230
#10. ……. मार्दवं जनयति ।
#11. पृष्ठवंश के उभय बाजु में पेशी बंधन का कार्य करते है ।
#12. रजोबहुलो।
#13. निम्नतः सन्निकृष्ट प्रणाली बाली ज्ञानेंन्द्रिय है। (काश्यप)
#14. चरकाचार्य के अनुसार सबसे बाहर की त्वचा है।
#15. काश्यप के नुसार तामसिक प्रकृतियाँ है।
#16. तृष्णा उत्पादक अवयव ऐसा वर्णन इस अवयव संबंधीआया है।
#17. गुंजाफल सवर्ण’ शुद्ध आर्तव का वर्णन किया है।
#18. वाग्भट के अनुसार कलल अवस्था दिन तक रहती है ।
#19. माता व्यवाय प्रतिषेध, पिता का बीज दुर्बल होने से नपुंसक उत्पन्न होता है।
#20. वाग्भटनुसार कक्षधर मर्म रचना भेद से वर्णित है।
#21. स्त्री शरीर में अपत्यपथ में पेशीयाँ होती है।
#22. असत्य विधान चूनिये । 1) गर्भ का पोषण उपस्नेह, उपस्वेदन न्याय से होता है। (चरक) 2) गर्भ का पोषण उपस्नेह न्याय से होता है (सुश्रुत ) 3) गर्भ का पोषण केदारकुल्या न्याय से होता है(वान्भट) 4) गर्भ का पोषण केदारकुल्या न्याय से होता है । ( सुश्रुत )
#23. “क्रियाणामप्रतिघातममोहं बुद्धिकर्माणाम्’ इसका कार्य है।
#24. कला कि उत्पत्ति धातु आशय के बीच स्थित……के पाक से होती है।
#25. कण्ठहृदयनेत्रस्थित संधि का प्रकार है।
#26. चरकाचार्य के अनुसार ऋतुकाल होता है।
#27. पुरुष का गुण है।
#28. निम्न में से अवेध्य सिरायें नहीं है ।
#29. मन’ की अभिव्यक्ति इस मांस में होती है। सु. शा.
#30. पायु’ का अधिदैवत है। (सु. शा. 1)
#31. खुड्रिडका गर्भावक्रान्ति अध्याय में पुनर्वसु एवं इस आचार्य के बीच संवाद हुआ।
#32. इस का समावेश मन के विषय एवं कर्म में किया है ।
#33. काश्यपनुसार कुर्चा की संख्या लिखे ।
#34. वाय्वाग्निदोषाद् वृषणी नाशं, नपुंसक है।
#35. पार्श्वद्वयोन्नम्’ वाग्भट के अनुसार गर्भ लक्षण है।
#36. तु मृदूपाकः ।
#37. शरीरवृद्धिकर भाव है।
#38. योपस्तंभ में समाविष्ट निद्रा का प्रकार है।
#39. उपचारहित चिकित्सा को ……. चिकित्सा कहते है ।
#40. ‘अहुकोष्ठक’ यह विशेषण इस अवयव संबंधी आया है।
#41. सुश्रुतनुसार द्वितीय त्वचा का नाम है।
#42. तितिक्षा’ मन का गुण है।
#43. वाग्भट के नुसार पुरुष शरीर की लंबाई है।
#44. कफमेदप्रसादात……..। इसकी उत्पत्ति होती है।
#45. शुक्रस्य बाहुल्यात जायते पुमान रक्तस्य स्त्री, तयो साम्ये क्लिबः । संदर्भ है।
#46. सुश्रुताचार्य के अनुसार प्रसारण आकुंचन कर्म है।
#47. शरीर में कफ का क्षय एवं वात के बढने के कारण आनेवाली निद्रा को कहते है ।
#48. गर्भधारणापूर्व स्त्री को आहार सेवन करना चाहिए। काश्यप
#49. प्राण, प्राणायतन क्रमशः होते हैं।
#50. जोडीयाँ मिलाएं 1. सर्वछिद्रसमूह a) पृथ्वी 2. सर्वचेष्टासमूह b) आकाश 3. सर्वमूर्तिसमू c) आप 4. सर्वद्रवसमूह d) बाबु
#51. आहार परिणामकर भावों में स्नेह का कार्य है।
#52. गर्भ में नाभि की सर्वप्रथम उत्पत्ति होती है। च. शा. 6/21
#53. तन्द्रा की उत्पत्ति होती है।
#54. बराह मांस खाने से होनेवाला गर्भ होता है। (सु.शा. 3 / 19 )
#55. वाग्भट के नुसार कूर्च मर्म रचना भेद से वर्णित है।
#56. चरकानुसार विद्रधि इस त्वचा में होती है।
#57. वीर्य’ भाव है।
#58. गोसर्पि सम’ वर्ण होता है।
#59. चरकाचार्यानुसार विसर्ग कर्म है।
#60. तर्पयनित वपुः कृत्स्नं ता मर्मण्याश्रितास्ततः। इससे संबंधित वर्णन है।
#61. मणिबंध मर्म का अंगुली प्रमाण है।
#62. वाग्भट के अनुसार पुसंवन विधि करना चाहिये ।
#63. हस्त का कर्म है।
#64. शुक्र का वर्ण होता है अ. छ. शा. 1/17
#65. एक सक्थि प्रदेश में अवेध्य सिरायें होती है।
#66. प्रथम कला का नाम है।
#67. बीजे बीजभागावयवः प्रदोषमापद्यते तदा …. जनयति ।
#68. मूल धमनीयों की संख्या है।
#69. वाग्भट के नुसार सीमन्त होते है।
#70. कुल्माष’…… के चिकित्सार्थ उपयोगी है।
#71. सर्वभूतानाम् उदरस्थ अण्वस्थिषु च महत्सु च मज्जा भवति । इससे संबंधित वर्णन है।
#72. अशस्त’….का मिथ्यायोग है।
#73. वाग्भट के नुसार त्वचा कि उत्पत्ती होती है।
#74. मज्जा का अंजली प्रमाण है।
#75. सर्वकुष्ठ को उत्पन्न करनेवाली त्वचा है। (शा. पु. 5/37)
#76. स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान सन्ततांश्च जरायुणाम् । वर्णन है।
#77. पक्ति रस का अंजली प्रमाण है। (काश्यप)
#78. शुक्र का अंजली प्रमाण है।
#79. स्तन’ का इस स्त्रोतस के मूल स्थान में समावेश किया है।
#80. किलास व्याधि का अधिष्ठान है। (शा.पू. खं. 5/37)
#81. तृतीय मास में चरक अनुसार मासानुमासिक परिवृद्धि लक्षण है। a) स्थिरत्व हाँ/सही नहीं / गलत b) मांसशोणित उपचय हाँ नहीं c) बलवर्ण उपचय हाँ नहीं d) गर्भ सर्वभाव आप्यायते हाँ नहीं
#82. मस्तुलुंग क्षय’ इस मर्माघात का लक्षण है ।
#83. चरक के अनुसार स्कंधाश्रित महामर्म है।
#84. प्रभा भाव है।
#85. मांस भाव है !
#86. पेशी की उत्पत्ति में कारण धातु है ।
#87. काश्यप के अनुसार स्त्री शुक्र एवं पुरुष शुक्र इतने वर्ष पर परिपक्व होते है।
#88. पक्वाशयोर्मध्ये सिराप्रभवा…..।
#89. कालीयक की उत्पत्ति होती है।
#90. पंचतत्व का वर्णन इससे संबंधित है।
#91. चरक के अनुसार पेशीयों की संख्या है।
#92. Match the column: Column-A. लोकगत भाव 1. सर्गादि 2. वियत 3. सोम 4. युगान्त Column-B. पुरुषगत भाव a) सुषिराणी b) गर्भाधान c) मरण d) प्रसाद
#93. तम प्रवेश’ उत्पत्ति इस त्वचा में होती है।
#94. दौहृद में तित्तीर मांस सेवन इच्छा से गर्भ उत्पन्न होता है ।
#95. सुश्रुत अनुसार मांसवह स्त्रोतस का स्थान है।
#96. गात्र पंचक की व्यक्ति मांस में होती है।
#97. इन्द्रियार्थेषु सम्प्राप्ति गौरवम्’ इसका लक्षण है।
#98. शुकेरिवाकिरणेपुर्ण:’ जैसी वेदना मर्माघात में होती है ।
#99. सत्या……बाकू का भेद है। (च. शा. 1)
#100. जिव्हा अक्षि नासिका स्रोत्र इन चार छिद्रों के संगम स्थान पर मर्म स्थान है।
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