Charaka Viman Set – 3
#1. यदा ‘प्रकृतहेतौ वाच्ये यद्विकृतहेतुमाह’ तत् किम् – (च.वि. 8 / 63)
#2. त्वक्सिरास्नायुमांसतरुणास्थि भक्षण करनेवाले कृमि है।
#3. निम्न में से अपतर्पण का भेद नहीं है।
#4. वादि-प्रतिवादी हेतु में एक दूसरे के दोष निकालना है।
#5. जनपदोद्ध्वंसनीय अध्याय के बारे में चर्चा….. प्रदेश में हुई।
#6. ……. प्रतिकर्मसमारम्भः ।
#7. कुसुम्भ शांक का अनुपान है।
#8. उर्ध्व और अधः मार्ग से आमदोष का प्रवृत्त होना किसका लक्षण है।
#9. अपतर्पण में दोषावसेचन……दोष बल रहने पर करें।
#10. …….नाम साध्यवचनं
#11. सिराग्रन्थयो मरणं च ।’ लक्षण विद्धस्रोतस ।
#12. स्थूलदीर्घवृत्तसन्धयश्च……..सा।
#13. वादमार्ग पदों में ‘जिज्ञासा’ पद का क्या अर्थ है।
#14. निम्नमें से यह कृमि का प्रकार नहीं है।
#15. कृमि चिकित्सा का सिद्धान्त है।
#16. …….नाम हेतोः दोषवचनं ।
#17. चक्रपाणीनुसार दन्दशूकाः का अर्थ है।
#18. जिज्ञासा नाम…..
#19. बलमानविशेष ज्ञानार्थ…. परिक्षा करते है।
#20. ‘नित्यग’ के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौनसा कथन सही हैं ?
#21. सौरस’ यह कृमि है।
#22. किस परिषद में कभी भी किसी के साथा जल्प / वादविवाद नहीं करना चाहिए।
#23. चरकनुसार रोगानीक की संख्या है।
#24. मूत्रवह स्रोतस की विकृति में किसके समान चिकित्सा की जाती है।
#25. कृमिनाशक ‘विड्ग घृत’ किसने बताया है।
#26. सततसन्धिशब्दगामिनश्च’ लक्षण इस गुण से है।
#27. दिर्घायु का कारण है।
#28. इस कृमि का निदान कुष्ठ व्याधि जैसा होता है ।
#29. कार्श्य’ उत्पन्न करने वाले कृमि है।
#30. निम्नमें से यह प्रभाव का प्रकार नहीं है।
#31. श्रीमद भाजिष्णु’ इस धातुसारता का लक्षण है।
#32. जनपदोदध्वंस का मुख्य कारण है।
#33. अध्ययन विधी का योग्य काल है। च.बि. 8/7
#34. शास्त्रज्ञान के साधन है।
#35. चरकानुसार लवण होता है।
#36. ‘कटुमद्रा’ किसका पर्याय है।
#37. विज्ञान….
#38. त्रिदोष प्रकोप के लिए कारणीभूत है।
#39. संशोधन के बाद …. सेवन से सर्वशरीरगत व्याधि होता
#40. सुश्रुतनुसार मंदाग्नि… प्रकृतिवाले पुरुष का है।
#41. वातलानां च सेवनात… स्रोतोदृष्टी हेतु है।
#42. वाग्भटनुसार विधी भेद से कृमी के प्रकार
#43. किस आचार्य ने पुरुष को ‘स्रोतस्’ का समुदाय कहा है।
#44. धुम्र पवन’ होना…. विकृति के लक्षण है।
#45. काश्यॅ एवं पारुष्य इस कृमि के प्रभाव है।
#46. स्रोतस का पर्याय है।
#47. निम्नमे से यह शास्त्र ज्ञान का साधन है।
#48. दशविध रोगी परीक्षा विधी में समाविष्ट नहीं है।
#49. क्षीरपुर्णलोचना’ लक्षण सारत्व का है।
#50. चरकानुसार रोगविशेष विज्ञान के साधन है।
#51. द्रव्य के इस गुण को प्रकृति कहते है।
#52. रोग के ‘स्वधातुवैषम्य एवं आगन्तुज भेद’ किस आधार पर किए गए है।
#53. आमदोष से कौन सा स्रोतस दुष्ट होता है।
#54. विष्टब्धाजीर्ण में इस दोष का प्रभाव होता है।
#55. सभी कृमियों का आद्य उपक्रम है।
#56. सुश्रुतनुसार पुरीषज कृमि संख्या ।
#57. सुश्रुतनुसार मूकवह स्रोतस का मूल स्थान।
#58. काल का अन्य नाम हैं।
#59. सत्वादिनामधम’ इसकी विशेषता है।
#60. अनुमान ज्ञेय भाव ‘मेधा’ का अनुमान किससे होता है।
#61. यत्र मूर्ख विदुषां बुद्धि यो वर्ण्य वर्णयति’ है।
#62. ओकसात्म’ इसके अधिन आता है।
#63. देश’ का वर्णन……… में है।
#64. आहारविधी विधान….. लोगों के लिए है।
#65. चरकानुसार विषसदृश लक्षण वाला, परम असाध्य आशुकारि और विरुद्धचिकित्सीय व्याधि होता है।
#66. न ह्यस्य प्रत्येक्षेण ग्रहणमुपद्यते ….. ।
#67. सारसंहत स्थिर शरीरा…. प्रकृती के लक्षण है।
#68. अभयादि मोदक का वर्णन इस आचार्य ने किया है।
#69. नियुद्ध’ चिकित्सा इसलिए करते है ।
#70. त्वकसिरास्नायुमांस तरुणास्थिभाक्षणामिति’ कृमि है।
#71. कारण’ अर्थात है।
#72. पाणदाह चिकित्या इस रोग की है।
#73. दोष प्रमाण’ का अनुमान किससे होता है।
#74. चरक संहिता का ‘मान स्थान’ कहलाता है।
#75. आमदोष व प्रभाव के प्रकार क्रमसे है।
#76. आतुरपरीक्षा के प्रकार है।
#77. शिथिलमांसशोणिता’ लक्षण इसके अतिसेवन से होते है।
#78. ङ्गदिवास्वापफ इस स्त्रोतोदृष्टि का हेतु है।
#79. ग्रहणी का मृदु या दारूण होना,…. परीक्षा की सहायता से
#80. मनोऽर्थ का अनुमान होता है।
#81. ‘अष्टविध आहारविशेषायतन’ का वर्णन किस आचार्य ने किया हैं।
#82. सुश्रुत ने स्रोतस का वर्णन नहीं किया।
#83. धुम्रपवन’ जनपदध्वंस के कुल चार कारणोमे से इसके विकृती का लक्षण है।
#84. चरकानुसार देश के भेद है।
#85. …..धातुसाम्य, तस्य लक्षण विकारो प्रशमनं ।
#86. ….. से युक्त आहार सर्वदोष प्रकोपक होता है।
#87. सुखशीलता’ कौनसे दोष की चिकित्सा है।
#88. जिस चिकित्सा का फल अशुभ सम्भावित हो, वहा पर ….
#89. त्रिविध ज्ञान साधनों में सबसे पहले किसके द्वारा ज्ञान करना चाहिए।
#90. शुष्कान्नसेवन’ इस स्त्रोतोदुष्टी का हेतु है।
#91. वाद संभाषा मे अनवहित रहने वाले व्यक्ती के लिए यह निग्रहोपाय करना चाहिये।
#92. सहज किसका भेद नहीं है।
#93. निम्न में से वाक्य दोष का प्रकार है।
#94. बलमानविशेषज्ञानार्थ मुपदिश्यते…. परीक्षा है।
#95. यथोक्त समुत्थान प्रशमन भवत्य………, व्याधि ।
#96. पित्तं जनयन्ति रस है।
#97. पाययित्वा सलवणमुष्णं वारि । इस व्याधि की चिकित्सा है।
#98. रक्तस्तंभन के उपायों में सर्वोत्तम है।
#99. समुद्रि प्राणी सेवनान्ते अनुपानार्थ उपयोगी है।
#100. मुलकपर्णी स्वरस इसलिये उपयोग में लाते है।
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80/100 – Dr. Alok Sharma