Sharira Sthan Set – 2
Amazing! Keep practicing. Best wishes. You tried well! Keep practicing. Best wishes. #1. स्त्रियों में यह आशय अधिक होता है।
#2. पुसंवन विधि में पुत्र इच्छा करने वाली स्त्री के नासापुट में औषधि द्रव्य डालना चाहिए ।
#3. बुद्धि की देवता है।
#4. स्त्री दुग्ध में तिक्त रस का वर्णन इस संहिता में मिलता है।
#5. कटिक तरुण, क्षिप्र मर्म प्रकार है।
#6. अष्टांगहृदय नुसार सीमन्त संख्या है।
#7. वक्री सन्तानों की उत्पत्ति में कारण है।
#8. रस की उत्पत्ति होती है।
#9. वैकारिक और तेजस अहंकार से इन्द्रियों की उत्पत्ति होती है।
#10. सुश्रुतनुसार श्रेष्ठ धात्री का वर्ण होता है।
#11. शारंगधरानुसार रज्जुं की संख्या है।
#12. सर्व शरीर व्यापी कला है।
#13. कण्डराएं होती है।
#14. पुरुषाकृतिभूयिष्टयपुरुषं……. नाम ।
#15. शुद्ध शुक्र के लक्षण होते है।
#16. पवनेन्द्रिय कहते है ।
#17. पाददाह में इस मर्म पर सिरावेध करें।
#18. ग्रीवा में कण्डरायें होती है।
#19. सद्य प्राणहर मर्म में यह महाभूत प्रधान होता है।
#20. आर्तव महाभूत प्रधान होता है।
#21. कर्णास्थि प्रकार का है।
#22. शारंगधरानुसार स्त्री शरीर में रन्ध्र होते है।
#23. मर्म पर आघात होने से रक्त निर्गम होकर मृत्यु होती है।
#24. अपलाप, नाभि मर्म है।
#25. गर्भिणी को आस्थापन बस्ति इस माह में देते है। (सुश्रुत )
#26. ‘त्वक्’ भाव है।
#27. प्राणियों का प्राण इसमें रहता है।
#28. इस दोष के प्रकोप से शुक्र क्षीण होता है।
#29. रात्री जागरण से दोषात्मक व्याधि होती है।
#30. विष्णु की माया है।
#31. अधोगामी धमनियाँ इस आशय को प्राप्त होती है।
#32. प्रकाश’ कौनसा भाव है।
#33. धमनी मर्म का विशेष
#34. पुरुषगत सुख की लोकगत इस भाव से समानता है।
#35. चरकानुसार धातुव्यूहनं कर्म है।
#36. रजोनिवृत्ति काल है।
#37. उदकवह स्रोतस के मूल है।
#38. पृष्ठवंश ये प्रकार का संधी है।
#39. शरीरवृद्धिकर भाव में समावेश नहीं है।
#40. चेतना धातु इस माह में व्यक्त होती है। सुश्रुत
#41. इस त्वचा का प्रमाण ब्रीहिभाग तुल्य है ।
#42. मांसल प्रदेश पर सिरावेध करना चाहिये ।
#43. अधस्तु दक्षिण भागे हृदयात….. तिष्ठति ।
#44. स्थिर के विपरित का लोकगत भाव है। गुणहै।
#45. शोणितेगर्भाशय बीजभागावयव प्रदोष से उत्पन्न होता है।
#46. चरक के अनुसार भूतप्रकृति प्रकार है।
#47. बालक जन्म के बाद मुख साफ करना चाहिए।
#48. भाद्रशोनक नुसार गर्भाशय में सर्वप्रथम इस अंग की उत्पत्ति होती है। (चरक)
#49. कास श्वास में सिरावेध करें।
#50. गर्भ में सभी इन्द्रियों की उत्पत्ति इस माह में होती है।
#51. वारुणी का प्रयोग इस के क्षय की पूर्ति हेतु किया जाता है।
#52. सुख प्राप्ति की इच्छा से इस की प्रवृत्ति होती है।
#53. विसर्प, वातशोणित में सिरावेध करें।
#54. ग्रीवा में अवेध्य सिरायें है।
#55. सुखदुःखादि का कर्ता है।
#56. बर्हिमुख स्रोतस की संख्या है। सुश्रुत
#57. सर्प या वृश्चिक जैसी संतान उत्पत्ति में कारण है।
#58. बुद्धि तत्व की उत्पत्ति इससे होती है ।
#59. इस विकार में पार्श्व स्कंद सन्धि के नीचे सिरावेध करें।
#60. इस मर्म के आघात से तुरन्त मृत्यु होती है।
#61. गर्भ नाड़ी की उत्पत्ति से होती है।
#62. सुश्रुत ने इस स्थान को ज्योति स्थान कहा है।
#63. उपप्लव है।
#64. चिकित्सा की दृष्टि से असाध्य शुक्रदोष है।
#65. दुध का वहन धमनियों द्वारा होता है।
#66. अतिवाहिक पुरुष का वर्णन किया है।
#67. शारंगधरानुसार सप्तम त्वचा का नाम है।
#68. इस मर्म में रक्त पूयरूप होने से मृत्यु होती है।
#69. विपाप’ पर्याय है।
#70. दोष त्वचा के नीचे हो तो इससे सिरावेध करना चाहिए ।
#71. इस मर्म पर आघात होने से पैर तिर्यक होकर उसमें कम्प होता है।
#72. ग्रंथिभूत आर्तव में इस द्रव्य का प्रयोग करते है ।
#73. भावप्रकाशकार ने ऋतुकाल माना ।
#74. ‘परिवृत्यावाक्शिरा’ गर्भ की स्थिति कालीन है।
#75. आर्तव बंद होने के उपरान्त इतने दिन के काल को ऋतुकाल कहा जाता है।
#76. अश्विनौ.
#77. आत्मा में मन के इस भाव के रहते सुख दुःख की प्रतीति नहीं होती।
#78. दिवास्वापं ….. व्याधि में हितकर है।
#79. वृक्षादनी, पयस्या, लता, सारिवा आदि से सिद्ध दुग्ध गर्मिणी को इस माह में देना चाहिए।
#80. अग्नि में इस महागुण की अधिकता होती है।
#81. सर्ववहाः समूला’ इस के लिए कहा है।
#82. गोक्षुर से पकायें हुए घृत अथवा यवागू का पान गर्भिणी को इस माह में करवाना चाहिए।
#83. कालान्तर मर्म के समीप आघात होने से लक्षण उत्पन्न होते
#84. विश्वाची में इस रोग के समान सिरावेध करें।
#85. अतुल्य गोत्रीय शारीर अध्याय में रोगोत्पत्ति का दूसरा कारण माना है।
#86. बालक शक्तिमान होने के बाद इसके समान विद्या पढनी
#87. तन्द्रा दोष प्रधान है।
#88. कफ प्रसादभाग इस अवयव की उत्पत्ति में समाविष्ट नहीं
#89. इस स्रोतस के विद्ध होने से तृष्णा और तात्काल मृत्यु यह लक्षण उत्पन्न होते है।
#90. यह त्वचा सभी वर्ण को प्रकाशित करती है।
#91. अष्ट प्रकृति और सोलह विकार युक्त है।
#92. इसका समावेश स्थिर संधि प्रकार में होता है।
#93. स्मृती के कारण है
#94. आत्माइंद्रियमनोऽर्थानां योऽय पुरुषज्ञसंज्ञक । ……. धात्वात्मक पुरुष है।
#95. अष्टांगसंग्रहनुसार कोष्ठांग है।
#96. आहार परिणामकर भावों में मार्दव कर्म…. का है।
#97. सुषुम्ना का प्रथम वर्णन इस आचार्य ने किया है।
#98. कोष्ठ में मर्म होते हैं।
#99. शुक्र और रज के संयोग से व्यक्त होकर निरंतर रहनेवाला है।
#100. सिरा से संबहन होता है।
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