#20. तृष्णा विकार में….. जलपान का प्रयोग करते हैं।
#21. की गतिक्षयोऽगानां यह इस कुछ का लक्षण है।
#22. विविध भूताशुचिस्मद्… च.नि. 8
#23. कुछ व्याधि में वमन…… के अन्तर से करना चाहिये।सु.चि. 9.43
#24. माधव निदान के अनुसार अल्पचेष्टा से क्षुद्रश्वास, तृष्णा,मोह, निद्रा, श्वासावरोध, क्षुधा, स्वेदाधिक्य, दौर्गन्ध्य इत्यादि लक्षण व्याधि में होते है। मा. नि. 34/3
#25. च्यवनप्राश सेवन मात्रा……….है
#26. क्षारोदकनिभं यह इस छर्दि का लक्षण है।
#27. वातकृद्वा कफहरं कफकृद्वाऽनिलापहम्। कार्य नैकान्तिकं ताभ्यां प्रायः श्रेयोऽनिलापहम् ।। यह इस व्याधि का चिकित्सासूत्र है।
#28. शुक्रक्षय का लक्षण है।
#29. बलातैल का रोगाधिकार है।
#30. सिद्धार्थक स्नान इस अध्याय में वर्णित है।
#31. बातरक्त व्याधि में रक्तमोक्षण के प्रकार
#32. दिवा प्रकोपो भवति रात्रौ शान्ति व्रजेच्च या ।दुर्विज्ञेया दुश्चिकित्स्या चिरकालानुबन्धिनी।। …व्याधि का लक्षण है। मा.नि. 4/18
#33. Gorilla face, bulldog scalp enlargernment of hands & feet is caused due to..
#34. सरक्तमूत्रत्व का लक्षण है।
#35. तरुण ज्वर में दोषपचनार्थ यह प्रयुक्त नहीं होता।
#36. बातज हृद्रोग की प्रधान चिकित्सा क्या है सु.उ.43.11
#37. रोगख्याको हेतुः ।
#38. प्रध्यानशील इस शोष का लक्षण है।
#39. उद्गारबाहुल्य यह… का पूर्वरूप है।
#40. अपस्मार व्याधि का बेगकाल है।
#41. कलिंग, पटोलपत्र, कटुकरोहिणी सिद्ध कषाय इस ज्वर में प्रयुक्त होता है।
#42. हा अन्न सेवन इस बातव्याधि में प्रयुक्त होता है।
#43. कर्दम व्याधि है।
#44. कश्विद्… ऋते सम्भवति गुल्मा च.नि. 3.16
#45. सभी मेध्य रसायनों का अनुपान..है
#46. आहारपरिणामान्ते भूयश्च लभते बलम् । यह इस हिक्का का लक्षण है।
#47. व्याधि त्वक्ांसाबित होता है।
#48. वृषणकच्छू में दोषदुष्य क्या है।
#49. बातबस्ति के प्रकार है। नाग्भट
#50. शिरसः शून्यता कौनसे व्याधि का पूर्वरूप है।
#51. वाग्भट नुसार समसमा गुटिका का रोगाधिकार क्या है।
#52. आमलकी में यह रस नहीं होता।
#53. देव लोग से उन्माद का आक्रमण कैसे होता है। ब. नि. 7
#54. निरामकफ निम्न में से नहीं होता।
#55. रुणद्धि उच्छ्रासमार्ग तु प्रनष्टबलचेतसः…… व्याधिलक्षण है।
#56. यह अपस्मार का पूर्वरूप है। मा.निं.
#57. स्त्रियों में इस स्थान से उत्पन्न होनेवाला शोथ असाध्य होता है।
#58. अनविविकृत हं.. अपस्मार का लक्षण है।
#59. छर्दि में स्नेहविरेचन प्रयुक्त होता है। वाग्भट
#60. कृतेऽप्यकृतसंज्ञः इस अतिसार का लक्षण है।
#61. निम्न में से इस ज्वर में मदोवह सिरा का अवरोध होता है।
#62. चरक के अनुसार मुखरोगों की कुल संख्या है।
#63. प्रतिहतवचन इस उन्माद का लक्षण है।
#64. ज्वरातिसार प्रभृतीनांच दीर्घकालानुबंध: यह व्याधि की कौनसी अवस्था है।
#65. विदग्ध कफ का रस होता है।
#66. श्लेष्मणः क्षपणं यत् स्यात् न च मारुतमावहेत् । तत् सर्वं सर्वदाकार्यम्… भेषजम् ।
#67. न्यग्रोधारोह सदृश यह अर्शाकुर होते है।
#68. दोषबलप्रवृत्त यह निम्न में से कौनसा व्याधि है।
#69. हिक्का अनेक उपद्रवों से युक्त होती है।
#70. नरसिंहघृत इस आचार्य ने बताया है।
#71. प्रपुराण घृत… वर्ष पुराण पृत को कहते है।
#72. तृष्णोद्गारावरोधको यह कौनसे आमदोष का लक्ष्ण है।सु.उ. 56.8
#73. चरक के अनुसार भूषाघात के प्रकार है।
#74. चरक के अनुसार यह अतिसार का प्रकार नहीं है।
#75. अव्यक्तबुद्धि स्मृतिवाग्विचेष्टःयह इस मद का लक्षण है।
#76. कालकृत, अकालकृत थे…. व्याधि है।
#77. मूलजं कन्दजम् वा विषमासेक्यैत् व्याधि चिकित्सा है।
#78. अभिघातज ज्वर में.. दोष का प्रकोप होता है।
#79. सुश्रुत के अनुसार ….. ज्वर में दोष कण्ठस्थ होते है।
#80. व्यंजक….. है।
#81. स देशो रुज्यतेऽत्यर्थं व्याविद्ध इव वृश्चिकैः । लक्षण ?
#82. स्वरभेद चिकित्सा का वर्णन इस अध्याय में वर्णित है।
#83. मांस, मेद धातुगत ज्वर की चिकित्सा क्या है।च.चि. 3.316
#84. तत्त्य न स्नेहनं कार्यम् न बस्ति न विरेचनम् …. संदर्भ है।