#6. बाग्भटनुसार द्रव द्रव्य के वर्ग वर्णित किये है।
#7. 30 काष्ठा अर्थात्
#8. विशेषेण ग्रहणी अर्श विकारार्थ इस शाक का प्रयोग किया जाता है।
#9. धूमपानार्थ धूमनेत्र का अग्रभाग छिद्र प्रमाण है। (चरक)
#10. उदर्द व्याधि इस दोष का नानात्मज विकार है।
#11. वैद्यवृत्ति है।
#12. सुश्रुत के द्वादशअशन विचार में समाविष्ट नहीं है।
#13. बहुशोदृष्टकर्मता गुण इस चतुष्पाद का है। ‘
#14. उदर शुष्कता यह लक्षण क्षय में पाया जाता है।
#15. व्यायाम के लाभ है।
#16. रहस्य स्थान में अध्याय है।
#17. स्वभाववाद’ इस आचार्य की देन है।
#18. त्रिवर्ग साध्य होने में प्रमाण उपयुक्त होता है।
#19. चरक सूत्रस्थान में इसका समावेश प्राणायतन में नहीं है।
#20. “यस्य वात प्रकुपितस्त्वङ्गमांसान्तरमाश्रित सम्प्राप्ति है।
#21. निम्न में से इस क्षीरी वृक्ष का कर्म विरेचन है।
#22. छेदनीय, उपशमनीय रस वर्णन किये है।
#23. व्याध्युपसृष्टानां व्याधि परिमोक्ष।…. संदर्भ
#24. आचार्य ने उपस्थाता को प्रतिस्त्रावी कहा है।
#25. चरकाचार्य ने सर्वप्रथम इस संस्कार को ग्रहण किया है।
#26. बस्तिशोधनार्थं उपयुक्त उदक है।
#27. ‘जवोपरोध’ यह दोष व्यक्ति में पाया जाता है।
#28. क्रिमिशोफोउदरार्शोघ्न ……! दुग्ध के संबंध में वर्णन आया है।
#29. पौष्टिकं वृष्यमायुष्यं सुचि रूप विराजनम्। इस कर्म के लाभ है।
#30. ….. ..व्याधिनां त्रिविधो हेतुसंग्रह ।
#31. वाग्भट के नुसार शमनीय अपतर्पण के भेद है।
#32. यव… कर्म में श्रेष्ठ है।
#33. न च …. रात्रौ प्रयुज्जीत ।
#34. निम्न व्यक्ति में स्नान वर्ज्य है।
#35. अतिमात्राशन का हेतु है।
#36. इस महिने में गांङग जल बरसता है।
#37. चरकनुसार यूषभेद है।
#38. प्रतिपत्तिश्च कारण आप्तोपदेश है।… संदर्भ
#39. जल में श्रेष्ठ है। अ.सं.सू. 14/4
#40. आत्मवान’ यह गुण इसका है।
#41. माधव के प्रथम मांस में बस्ति देने का निर्देश है। अर्थात्
#42. ‘मेदोमांसोदकोपम्य्’ इस अतियोग का लक्षण है।
#43. दोषा कदाचित कुप्यन्ति जिताः । च. सु. 16/20
#44. करणं मत।
#45. त्रिदोषघ्न शाक है।
#46. हारित संहिता के उपलब्ध अध्याय है।
#47. नागबला का श्रेष्ठ कर्म है। अं.सं.सू. 13
#48. उचित (सम्यक) आहारमात्रा इस लक्षण से युक्त होती है।
#49. उपचारज्ञता यह गुण निम्नतः है।
#50. रंस भेद से स्नेह की विकल्पता स्थापित है। सु.
#51. सारासव की संख्या है।
#52. अपरान्ह काल में इस ऋतु के लक्षण दिखाई देते है।
#53. स्वेदन काल में हृदयसंरक्षणार्थ उपयोग किया जाता है।
#54. काष्ठीभुतो मृतोपमम् इस लक्षण से युक्त व्याधि है।
#55. घूर्णतीव शिर: इस शिरोरोग का लक्षण है।
#56. अर्क विलोकन वेगावरोध चिकित्सा में निर्देशित है।
#57. कुष्ठव्रणविषापहम् इस मूत्र का गुण है।
#58. पुनर्जन्म सिद्धि के अनुसार जोडियाँ लगाए । प्रमाण – 1. आप्तोपदेश 2. प्रत्यक्ष 3. अनुमान 4. युक्ति | लक्षण – a. कर्तृकरण संयोगात् क्रिया । b. कर्मसामान्ये फलविशेष। c. लोकानुग्रहप्रवृत्त । d. फलाद्बीजमनुमीयते ।
#59. हेमंत ऋतु में निम्नतः लेप का प्रयोग करें।
#60. रूक्षपूर्व स्वेद चिकित्सा सिद्धान्त है।
#61. इस प्रमाण से धर्म, अर्थ, काम साध्य होते है।
#62. ‘ताम्रचुडरस’ इस वेग चिकित्सा में देते है।
#63. परिक्षक के गुण है।
#64. भेदनदीपन अनुलोमनवातकफहर कर्म में श्रेष्ठ है।
#65. भोजन पचन के बाद अत्यधिक वेदना होना’ लक्षण है।
#66. धात्री निशा… I
#67. आयुर्वेद है।
#68. अतिसार यह व्याधि मार्ग का है।
#69. गलग्रह में इस सक्तु का प्रयोग वर्णित है।
#70. अक्षीव’ द्रव्य का इस महाकषाय में समावेश है।
#71. वंक्षणप्रदेशी स्वेदन करना चाहिए।
#72. संघात चारिण शब्द प्राणियों के लिये आया है।
#73. त्रिस्त्रेषणीय अध्याय में चरकाचार्य ने अतिरिक्त प्रमाण माना है।
#74. कृमिज छर्दी यह छर्दी प्रकार इस आचार्य ने बताया ।
#75. ‘महावास्तुपरिग्रहा’ इस मधुमेह पिडिका का लक्षण है।
#76. योनि विशोधन निम्नतः स्नेह का गुण है।
#77. नित्यानुशायिनी व्याधि होते है।
#78. मधु का श्रेष्ठ भेद है।
#79. शरदग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशो…. गर्हितम् ।
#80. ‘लाजागन्धि’ ऐसा वर्णन इस संबंध में आया है।
#81. ‘धितिका शयनान्तः प्रमाणेन’ इस स्वेद का वर्णन है।
#82. सामपित में स्नेहपान कराने से हानि होती है। 1. हत्वा संज्ञा 2. रंजेयेत देह 3. परिशुद्ध कोष्ठ 4. दीप्ताग्नि
#83. मर्मसंरोध’…… का उपद्रव है।
#84. इंद्रिय एवं महाभुत संबंध जानने के लिये प्रमाण उपयुक्त है।
#85. व्यायाम है।
#86. रस मुखवैशद्य शोष प्रल्हादकारक है।
#87. अतिकृश को सहन नहीं होता।
#88. काण्डासव की संख्या है।
#89. गुरु अपतर्पण यह सिद्धांत इस व्याधि की चिकित्सार्थ है ।
#90. आयुर्वेद का प्रयोजन है।
#91. पंचपल्लव का समावेश निम्नतः इस गण में किया है।
#92. विरेचन में मलादि इस क्रम से निकलते है।
#93. उचित पर्याय चुनिए ! दोष – 1. वात 2. पित्त 3. कफ | a.तर्ष b. कोथ c. उपदेह
#94. शारर्ङ्गधरनुसार विरेचनार्थ तीक्ष्ण औषधि मात्रा है।
#95. कास यह व्याधि इस प्रकार का है।
#96. निशासु निद्रा व्यक्ति का लक्षण है। अ. छ. सु.
#97. इस धारणीय वेग की चिकित्सा में अवपीडक सर्पि चिकित्सार्थ देनी चाहिए।