#43. इस पर्वत से निकली नदी का जल अमृत के समान होता है।
#44. विशेषत: दाह नाशन कर्म इस गण का है।
#45. इस काल में नस्य का सेवन नहीं करना चाहिए। (च.सू.1/57)
#46. स्वभावोपरमवाद का वर्णन इस अध्याय में आया है।
#47. महत पंचमूल की दोषघ्नता है।
#48. काकोली, क्षीरकाकोली का प्रतिनिधि द्रव्य है।
#49. ‘होलाक’ इस स्वेदप्रकार का वर्णन इस आचार्य ने किया।
#50. मर्म तथा संधियों से संबंधित विकार चिकित्सार्थ होते है।
#51. प्रकुपित कफ काकल प्रदेशी स्थित होकर शोथ उत्पन्न करता है।
#52. चरकनुसार मुखरोग संख्या है।
#53. इस ऋतु में नैऋत्य दिशा से हवा बहती है।
#54. दृश्य अदृश्य यह अर्श के प्रकार इस आचार्य ने वर्णन किये है।
#55. ऋतु के अनुसार बायु प्रवाह की दिशासह जोडियाँ मिलाए। 1. वसंत 2. ग्रीष्म 3. प्रावृट 4. हेमंत | a. उत्तर दिशा b. पश्चिम दिशा c. दक्षिण दिशा d. नैऋत्य दिशा
#56. ……. नाम उपलब्धीकारणं
#57. प्रदोषज विकारों में लंघन उपक्रम श्रेष्ठ है।
#58. स्वेदाग्निजननी…. वातवर्चोऽ नुलोमनी ।
#59. केशश्मश्रु लोम नख का संहार करना चाहिये ।
#60. ‘सर्षपकल्क अवलिप्तवत’ वेदना होती है।
#61. विरेचन आश्रय में इसका समावेश नहीं होता।
#62. षड्विरेचनशताश्रितीय अध्याय में कुल कषाय वर्णित है।
#63. हिक्काश्वासकरं दुग्ध है।
#64. न औषधे विना । चिकित्सा संबंधी वर्णन है।
#65. सुश्रुतनुसार वैद्य का गुण है।
#66. पराक्रम सुखं’ का लाभ है।
#67. शरद ऋतु में इस दिशा का वायु सेवन निषिद्ध है।
#68. घृतव्यापदानाशनी यवागू है।
#69. निम्नतः द्रव्य का शीर्षविरेचन के लिये बीज ग्रहण करें।
#70. वात के साथ कफ का संसर्ग होने पर स्वेदनार्थ गण प्रयुक्त है।
#71. यह उन्माद का असाध्य लक्षण होता है।
#72. चरक के अनुसार विसर्ग कर्म इस इन्द्रिय का है।
#73. परा, अपरा निद्रा के भेद इस आचार्य ने दिये है।
#74. सर्व अनुपानों में श्रेष्ठ है।
#75. तमप्रवेश’ नानात्मज व्याधि है।
#76. त्रिमर्म से अभिप्रेत है।
#77. धर्म, अर्थ, काम इन तीनों का समावेश होता है।
#78. मछली मांस सेवन से दोषदुष्टि होना’ यह दोषदुष्टि का हेतु है।
#79. ‘पांडुता’ इस धातुक्षय का लक्षण है।
#80. वाग्भट अनुसार अंजन शलाका की लंबाई है।
#81. यह द्रव्य प्रभाव से कार्य करता है।
#82. ‘स्तंभ गौरव शीतघ्न’ यह गुण इस उपक्रम से प्राप्त होते है।
#83. निम्नतः भौम जल के भेद में समाविष्ट नहीं है। सुश्रुत
#84. चरक ने तृष्णा के इस प्रकार का वर्णन नहीं किया है।.
#85. ‘मूत्रकृच्छ्र’ व्याधि है।
#86. अपामार्गतण्डुलीय अध्याय में यवागू एवं पेया संख्या क्रमशः है।
#87. विलेपी…..। सुश्रुत
#88. आमाशयगत बात में इस क्रम से स्वेदन करे।
#89. त्वगन्तरे व्रणगत स्त्राव को कहते है। च.शा. 7/15
#90. सत्व, आत्मा, शरीर इन तीनों को मिलाकर बनता है।
#91. दुर्नाम में उपयुक्त मूत्र प्रयोग। सुश्रुत
#92. सुश्रुत संहिता के कुल अध्याय है।
#93. ‘रोचन’ है। (च.सु. 1/70)
#94. संशोधन के बाद…. सेवन से सर्वशरीरगत व्याधि होता है।
#95. पुनर्जन्म सिद्धि के अनुसार जोडियाँ लगाए । प्रमाण – 1. आप्तोपदेश 2. प्रत्यक्ष 3. अनुमान 4. युक्ति | लक्षण – a. कर्तृकरण संयोगात् क्रिया । b. कर्मसामान्ये फलविशेष। c. लोकानुग्रहप्रवृत्त । d. फलाद्बीजमनुमीयते ।
#96. नस्यप्रकार एवं मात्रा (बिंदू), जोडी मिलाये । i) 8,16,32 ii) 8,12,16 iii) 6,8,10 iv) 4,6,8 v) 2 || a) प्रतिमर्श b) अवपीड c) बृंहण d) शोधन e) शमन