भावप्रकाशनिघण्टु
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भावप्रकाशनिघण्टु — एक परिचय
1) मूल परिचय
पूरा नाम: भावप्रकाशनिघण्टु (जिसे हरितक्यादि निघण्टु भी कहा जाता है)
ग्रन्थकार: आचार्य भावमिश्र
काल: 16वीं शताब्दी ईस्वी
ग्रन्थ-स्थिति: भावप्रकाश का निघण्टु-भाग; पूर्वार्द्ध में स्थानित
विषय: आयुर्वेद का द्रव्यगुण—औषधीय/आहार द्रव्यों के नाम-पर्याय, लक्षण, रस-गुण-वीर्य-विपाक, प्रभाव और रोगानुसार उपयोग का क्रमबद्ध वर्णन
समावेशन: औषधि-वनस्पति, खनिज/धातु/रत्न, पशु-उत्पत्ति द्रव्य, आहार-समूह (धान्य, शाक, दुग्धादि), पेय-जल, सन्धान-द्रव्य इत्यादि
2) विशिष्टता और महत्त्व
- चिकित्सा-उपयोगी औषधियों के साथ आहार-वर्गों का समन्वित विवेचन—यह इसे शुद्ध औषध-निघण्टुओं से अलग और अधिक व्यावहारिक बनाता है।
- प्रविष्टियाँ संक्षिप्त, स्पष्ट और कक्षा-अध्यापन/क्लिनिकल संदर्भ के उपयुक्त प्रारूप में—पर्याय → स्वरूप/लक्षण → गुणधर्म → चिकित्सोपयोग।
- प्रामाणिकता और स्मरण-सुगमता—अध्ययन तथा कंठस्थ दोनों के लिए अनुकूल शैली।
3) वर्ग-रचना
मानक रूप में भावप्रकाशनिघण्टु 23 वर्गों में संगठित है:
- हरितक्यादि वर्ग
- आम्रादि-फल वर्ग
- गुडूच्यादि वर्ग
- कर्पूरादि वर्ग
- पुष्प वर्ग
- वटादि वर्ग
- धातु/रत्न/खनिज (सुवर्णादि) वर्ग
- धान्य वर्ग
- शाक वर्ग
- मांस वर्ग
- कृतन्न वर्ग (पक्व/संस्कृत आहार)
- वारि (जल) वर्ग
- दुग्ध वर्ग
- दधि वर्ग
- तक्र वर्ग
- नवनीत वर्ग
- घृत वर्ग
- मूत्र वर्ग
- तैल वर्ग
- सन्धान वर्ग (आसव-अरीष्ट/किण्वित द्रव्य)
- मधु वर्ग
- ईक्षु वर्ग (गन्ना एवं शर्करा-उत्पाद)
- अनेकार्थ वर्ग (बहुअर्थक/विशेष शब्दावली)
अध्यापन में सुविधार्थ कई प्रकाशनों में सूक्ष्म क्रम-अन्तर मिल सकता है, पर वर्ग-नाम और विषय-सीमाएँ उपर्युक्त के अनुरूप ही हैं।
4) प्रविष्टि (Entry) का मानक ढाँचा
प्रत्येक द्रव्य सामान्यतः निम्न शीर्षकों में प्रस्तुत है—
- नाम-पर्याय: शास्त्रीय और जनपदीय/देशज नाम सहित
- स्वरूप/लक्षण: पहचान, उपयोग-अंश (फल/मूल/पर्ण/काण्ड/पुष्प/कष्ठ आदि)
- द्रव्यगुण: रस, गुण, वीर्य, विपाक, प्रभाव
- कर्म-कर्मप्रधान उपयोग: ज्वरघ्न, दीपनीय, वृष्य, रसायन, कफघ्न, व्रणरोपण आदि
- रोगानुसार संकेत: श्वास-कास, ज्वर, अजीर्ण, कुष्ठ, शोथ, उदर-विकार, हृद्रोग आदि
उदाहरण (रूपरेखा) – गुडूची (गुडूच्यादि वर्ग)
- पर्याय: अमृत, चिन्नरुहा, माधवी, तंत्रिका…
- उपयोग-अंश: काण्ड/पञ्चाङ्ग
- रस-गुण-वीर्य-विपाक: तिक्त-कषाय; लघु-स्निग्ध; उष्ण; कटु-विपाक
- प्रभाव/कर्म: ज्वरघ्न, दीपन-पाचक, रसयान, त्रिदोषशामक (विशेषतः पित्त-कफ), प्रतिरोधक क्षमता-वर्धक
- संकेत: ज्वर, प्रदाह/शोथ, दीर्घकालिक थकान, त्वक्-दोष, मधुमेह-संबद्ध क्लान्ति इत्यादि
5) सामग्री-विस्तार और द्रव्य-आवृत्ति
- कुल द्रव्य: प्रचलित मानक संस्करणों में लगभग 426 प्रविष्टियाँ प्रचलित हैं (औषध-वनस्पति + खनिज/धातु/रत्न + पशु-उत्पत्ति + आहार-समूह)।
- औषध-समूहों के साथ आहार-समूहों का तुलनात्मक वर्णन—पाठक को दैनन्दिन आहार-विन्यास और उपचार-योजना में द्रव्यगुण दृष्टि देता है।
- अनेक द्रव्यों के प्रतिनिधि (Pratinidhi) अवधारणा का उपयोग—जहाँ समान गुण-धर्म वाले द्रव्यों में पर्याय/प्रतिस्थापन संकेतित है।
6) अन्य निघण्टुओं से भिन्नताएँ
- धन्वन्तरि/राज/मदनपाल निघण्टु जैसे शुद्ध औषध-केंद्रित ग्रन्थों के विपरीत, यहाँ आहार-द्रव्य और सन्धान-द्रव्य भी समान गहराई से वर्णित हैं।
- पर्याय-सम्पदा और कर्म-समूह के व्यावहारिक संयोजन से यह स्नातक-स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में सबसे अधिक उपयोगी निघण्टुओं में गिना जाता है।
- गुण-सूत्रबद्धता: रस-गुण-वीर्य-विपाक-प्रभाव का अनुशासित क्रम—क्लिनिकल निर्णय-निर्माण (drug selection) में सीधी उपयोगिता।
7) अध्यापन-उपयोग
- What to memorize: 23 वर्ग-नाम, प्रत्येक वर्ग के 10–12 प्रमुख द्रव्य के पर्याय + गुणधर्म
- How to apply: ज्वर/शोथ/अजीर्ण/कुष्ठ/स्वास-कास/हृदय-व्याधि इत्यादि कर्म-समूह बनाकर वर्ग-वार द्रव्यों का चयन
- Cross-reference: आहार-वर्गों (धान्य/शाक/कृतन्न/दुग्ध/तैल/सन्धान/मधु/ईक्षु) को रोग-निदान और पथ्य-अपथ्य के साथ जोड़कर केस-डिस्कशन
8) संक्षेप (for quick revision)
- लेखक: आ. भावमिश्र | काल: 16वीं शताब्दी | स्थान: भावप्रकाश का पूर्वार्द्ध
- वर्ग: 23 | द्रव्य: ~426
- ढाँचा: पर्याय → लक्षण → रस-गुण-वीर्य-विपाक → प्रभाव/कर्म → रोगानुसार संकेत
- विशेषता: औषध-और-आहार का एकीकृत निघण्टु; शिक्षण और क्लिनिकल—दोनों के लिए अत्यंत उपयोगी
